दूसरों को सम्मान दिए बिना नहीं मिल सकता खुद को सम्मान-आचार्य पुष्पदंत सागर

August 07, 2017

बेंगलुरु
अहम को मारा, तिर गए,
अहम को माना, मर गए।
अहंकार क्या है? मैं, यह जो मैं है, इतना भंयकर राक्षस है कि जिसके पीछे पड़ जाए, अमर बेल की तरह पूरी तरह निचोड़ लेता है। मरते दम तक नहीं छोड़ता। अहंकार की कोई सीमा नहीं है। अहम को संभालने, पुचकारने वाला नादान है। इतना भी नहीं सोचता कि किस बात पर इतना अहंकार कर रहा है। यह बात रविवार को दसलक्षण पर्व के दूसरे दिन कर्नाटका जैन भवन में आचार्य श्री पुष्पदन्त सागर महाराज ने उत्तम मार्दव धर्म पर बोलते हुई कही। उन्होंने कहा कि अगर ज्ञान का अहंकार करता है तो तुमसे ज्यादा ज्ञानी हैं, अगर पद का अहंकार करता है तो राष्ट्रपति से बड़ा पद नहीं है। यदि सुंदरता का मान करते हो तो जगत में तुझसे भी ज्यादा सुंदर लोग हैं। धन का अहंकार करता है तो तीर्थंकर से ज्यादा वैभव अन्य किसी के पास नहीं है। किस बात का अहंकार करता है? आचार्य श्री ने कहा कि तेरे हाथ में कुछ नहीं है। पद भी तेरे हाथ में नहीं है, जनता कभी भी पद से उतार सकती है। यदि ताकत का मान है तो जरा से बुखार से दम निकाल देगा। जरा सा धक्का लगा, प्राण निकल जाएंगे। पापड़ जैसा मांस-हड्डियों का स्ट्रक्चर। प्रकृति की लीला ऑटोमैटिक है, तेरे हाथ में कुछ नहीं है। आचार्य श्री ने कहा कि नारियल-सुपारी के पेड़ झुकते नहीं है। इसलिए फोड़े जाते हैं और पत्तों की झाड़ू बनाई जाती है। केला मृदु है इसलिए मांगलिक कार्यों में इसका उपयोग करते हैं। बुखार से जैसे मुख का स्वाद मर जाता है तो भोजन की रुचि मर जाती है, उसी तरह अहंकारी के विचारों में धर्म-आस्था की भावना मिट जाती है। उन्होंने कहा कि दियासलाई स्वयं बिना दूसरों को जला नहीं सकती। वैसे ही मन स्वयं भी अहम जले दूसरों को जला नहीं सकता। मन की मांग है न कि ‘मुझे सम्मान चाहिए।’ मन की इस मांग में इतना परिवर्तन करो कि दूसरों को सम्मान दिए बिना सम्मान नहीं  मिल सकता। पहले दूसरों को सम्मान दो। बादाम डालकर दूध को जमाने से सफलता मिल सकती है, मगर अहम के साथ आत्मा की शांति नहीं मिल सकती। मन शरीर के गुणधर्म से एकदम भिन्न है। भोजन द्वारा शरीर को पुष्ट कर सकते हैं लेकिन सम्मान मन को तृप्त नहीं कर सकते। संपत्ति को बढ़ाने की प्रेरणा किसकी है? सर्वोच्च पद पाने की प्रेरणा किसकी है? सर्व सुंदर, हैंडसम दिखने की प्रेरणा किसकी है? बड़ी कोठी, सुंदर फर्नीचर, घर को डेकोरेट कराने की, मर्सीडीज गाड़ी लाने की प्रेरणा किसकी है? इन सब इच्छाओं का जनक अहंकार है। मैं किसी से कम नहीं हूं, यह कौन बोलता है? यह अहंकार बोलता है। मानहानि का दावा करता है? अहम। लडक़े की शादी में लाखों-करोड़ों कौन खर्च कराता है? अहम। क्रोध, मान, माया, लोभ के गुण-धर्म को समझे बिना और साधे बिना मोक्ष मार्ग नहीं बन सकता, मन शांत नहीं हो सकता। संसार में नंबर एक धनपति बनने की इच्छा खतरनाक है। नर से नारायण तो नहीं बना सकेगी मगर नरक का द्वार अवश्य खोल देगी, इसलिए कहा गया है कि अहंकार समस्त पापों का, विवादों का, संघर्षों का जनक है। सास-बहू के विवाद, बाप-बेटे में विसंवाद, पति-पत्नी में मुटाव, भाई-भाई में संघर्ष ये सब अहंकार के कारण हैं। मैं बड़ा और सब छोटे बने रहें, यह सोच अहंकार की है। अहंकार पानी-तेल की भांति है। पानी में रहकर भी अपना अस्तित्व अलग दिखलाता है। कागज की नाव की भांति कुछ पल तैरता और डूब जाता है। यही धर्म का सार है। इस धरती पर खेली गई लाखों-करोड़ों के खून की होली के युद्धों में सम्मान, लालसा, अहंकार के विजयी होने ने हीरो बनने का रोल अदा किया है। अहंकार को सलामत रखने के लिए युद्ध किए गए है। मृत्यु अभिमानियों की हुई है। दुर्योधन को मरना स्वीकार है, एक इंच जमीन देना स्वीकार नहीं है। रावण को सीता लौटाना स्वीकार नहीं, लंका दहन, परिवार का, स्वयं का मरण स्वीकार है। चीन और पाकिस्तान को सीमा से हटना स्वीकार नहीं है, लेकिन हारना स्वीकार है। इसका अर्थ यह है कि कलियुग की कलह सर्वनाश को निमंत्रण दे रही है। ध्यान रखें, भारत अभिमानी नहीं, स्वाभिमानी है। राम, कृष्ण, महावीर की जननी जन्मभूमि है। चुनौती नहीं देता, चुनौती देने वाले को समझने और संभलने का अवसर देता है। कृष्ण ने कौरवों को और राम ने रावण को कई अवसर दिए। यह उत्तम मार्दव धर्म का प्रभाव है।
इससे पहले त्यागी सेवा समिति के अध्यक्ष सुरेन्द्र कुमार हेगड़े ने बताया कि सुबह की सभा में भगवान आदिनाथ का पंचामृत अभिषेक, दसलक्षण विधान, शांतिधारा, सोलहकारण पूजा, पंच मेरु, नवदेवता, रविव्रत आदि की पूजा की गई। धार्मिक कार्यक्रम में सौधर्म इन्द्र विमला पद्माराजय्या जैन और विकास जैन, शांतिधारा प्रशांत पाटनी बेंगलुरु, पंचामृत अभिषेक विमला पद्माराजय्या को करने का लाभ मिला। रात्रि में सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन भी किया गया।

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