गांधी जी के जीवन से जुड़े 10 रोचक प्रसंग

गांधी जी के जीवन से जुड़े 10 रोचक प्रसंग

जयपुर ,1 अक्टूम्बर 2019/    दो अक्टूबर को गांधी जयंती है। इसके साथ ही राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का 150वां जयंती वर्ष भी पूरा हो जाएगा। वर्ष 1869 में बापू यानी मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म हुआ था। गांधी जी ने देश को अंग्रेजों से आजाद कराने में अहम भूमिका निभाईसाथ ही उनका जीवन अपने आप में आदर्श रहा। सत्य और अहिंसा के संदेश को दुनिया तक पहुंचाने वाले महात्मा गांधी के जीवन के प्रेरणादायी प्रसंग बहुत ही रोचक और शिक्षाप्रद हैं। आइए हम आपको बताते हैं उनके जीवन से जुड़े खास प्रसंगों कोजो हमें ज्ञान ही नहीं बल्कि ऐसी सीख भी देते हैंजिस पर अमल करने से जीवन में आई कठिनाइयों से आसानी से मुकाबला किया जा सकता है।


गांधी जी और टोपी

एक बार महात्मा गांधी से भेंट के लिए एक मारवाड़ी सेठ आए। वह बड़ी सी पगड़ी बांधे थे। बातचीत के दौरान उन्होंने पूछा– 'गांधीजी। आपके नाम पर लोग देश भर में गांधी टोपी पहनते हैं और आप इसका इस्तेमाल नहीं करतेऐसा क्यों?' गांधीजी मुस्कराते हुए बोले– 'आपका कहना बिल्कुल ठीक हैपर आप अपनी पगड़ी को उतारकर तो देखिए। इसमें कम से कम बीस टोपियां बन सकती हैं। जब बीस टोपियों के बराबर कपड़ा आप जैसे धनी व्यक्ति अपनी पगड़ी में लगा सकते हैं तो बेचारे उन्नीस आदमियों को नंगे सिर रहना ही पड़ेगा। उन्हीं उन्नीस आदमियों में मैं भी एक हूं।गांधीजी का उत्तर सुनकर सेठ चुप हो गया। लेकिन गांधीजी ने आगे कहा– 'अपव्यय संचय की वृति अन्य व्यक्तियों को अपने हिस्से से वंचित कर देती है। तो मेरे जैसे अनेक व्यक्तियों को टोपी से वंचित रहकर उस संचय की पूर्ति करनी पड़ती है।'

छूत-अछूत कुछ नहीं होता

यह बात उन दिनों की है जब महात्मा गांधी के पिता का तबादला पोरबंदर से राजकोट हो गया था। जहां गांधी जी रहते थेवहीं पड़ोस में एक सफाईकर्मी भी रहता था। गांधी जी उसे बहुत पसंद करते थे। एक बार किसी समारोह के मौके पर गांधी जी को मिठाई बांटने का काम सौंपा गया। गांधी जी सबसे पहले मिठाई उस सफाईकर्मी को देने लगे। जैसे ही गांधी जी ने उसे मिठाई दीवह गांधी जी से दूर हटते हुए बोला— 'मैं अछूत हूं इसलिए मुझे मत छुएंं।गांधी जी को यह बात बुरी लगी और उन्होंने उस सफाई वाले का हाथ पकड़कर मिठाई पकड़ा दी और उससे बोले— 'हम सब इंसान हैछूत-अछूत कुछ नहीं होता।उनकी बात सुनकर सफाईकर्मी के आंसू निकल गए।

ग्रेज के पत्र से निकाली आलपिन

एक अंग्रेज ने महात्मा गांधी को पत्र लिखा। उसमें गालियों के अतिरिक्त कुछ नहीं था। गांधीजी ने पत्र पढ़ा और उसे रद्दी की टोकरी में डाल दिया। उसमें जो आलपिन लगी हुई थीउसे निकालकर सुरक्षित रख लिया। वह अंग्रेज गांधीजी से प्रत्यक्ष मिलने के लिए आया। आते ही उसने पूछा— 'आपने मेरा पत्र पढ़ा या नहीं?' गांधी बोले— 'बड़े ध्यान से पढ़ा है।उसने फिर पूछा— 'क्या सार निकाला आपने?' महात्मा गांधी ने कहा— 'एक आलपिन निकाला है। बसउस पत्र में इतना ही सार था। जो सार थाउसे ले लिया। जो असार थाउसे फेंक दिया।'

समय ही सबसे कीमती

दांडी यात्रा के समय बापू एक स्थान पर रुके। जब वह चलने को हुए तो उनका एक अंग्रेज प्रशंसक उनसे मिलने आया और बोला— ‘हैलो मेरा नाम वॉकर है।बापू उस समय जल्दी में थेइसलिए चलते हुए ही विनयपूर्वक बोले— 'मैं भी तो वॉकर हूं।इतना कहकर वह जल्दी-जल्दी चलने लगे। तभी एक सज्जन पूछ बैठे, 'बापू अगर आप उससे मिल लेते तो आपकी प्रसिध्दि होती और अंग्रेजी समाचार-पत्रों में आपका नाम सम्मानपूर्वक छपता। बापू बोलेमेरे लिए सम्मान से अधिक समय की कीमत है।

कर्म बोइए और आदत को काटिए

धीजी एक छोटे से गांव में पहुंचे तो उनके दर्शनों के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। गांधीजी ने लोगों से पूछा, 'इन दिनों आप कौन सा अन्न बो रहे हैं और किसकी कटाई कर रहे हैं?' भीड़ में से एक वृध्द व्यक्ति बोला, ‘आप तो बड़े ज्ञानी हैं। क्या आप इतना भी नहीं जानते कि ज्येष्ठ माह में खेतों में कोई फसल नहीं होती। इन दिनों हम खाली रहते हैं। गांधीजी ने पूछा, 'जब फसल बोने व काटने का समय होता हैतब क्या बिलकुल भी समय नहीं होता?' वह व्यक्ति बोला, 'उस समय तो रोटी खाने का भी समय नहीं होता।गांधीजी बोले, 'तो इस समय तुम बिलकुल निठल्ले हो और सिर्फ गप्पें हांक रहे हो। अगर तुम चाहो तो इस समय भी कुछ बो और काट सकते हो।गांव वाले बोले, 'कृपा करके आप ही बता दीजिए कि क्या बोना और क्या काटना चाहिए?' गांधीजी गंभीरतापूर्वक बोले—


आप लोग कर्म बोइए और आदत को काटिए,

दत को बोइए और चरित्र को काटिए,

रित्र को बोइए और भाग्य को काटिए,

तभी तुम्हारा जीवन सार्थक हो पाएगा।



कभी झूठ का सहारा मत लो

एक दफा गांधी जी के बड़े भाई कर्ज में फंस गए थे। भाई को कर्ज से मुक्त कराने के लिए गांधी जी ने अपना सोने का कड़ा बेच दिया और उसके पैसे भाई को दे दिए। मार खाने के डर से गांधी जी ने अपने माता-पिता से झूठ बोला कि कड़ा कहीं गिर गया है। लेकिन झूठ बोलने के कारण गांधी जी का मन स्थिर नहीं हो पा रहा था। उन्हें अपनी गलती का अहसास हो रहा था और उनकी आत्मा उन्हें सच बोलने के लिए कचोट रही थी। ऐसे में उन्होंने एक कागज पर लिखकर सारी सच्चाई पिता को बता दी। गांधी जी को लगा कि पत्र मिलने पर पिता उन्हें बहुत पीटेंगेपर पिता ने ऐसा कुछ नहीं किया। इस बात से गांधी को गहरी चोट पहुंची। तब गांधी जी को अहसास हुआ कि प्यार हिंसा से ज्यादा असरदार दंड दे सकता है।

गलती होने पर मांग लें माफी

गांधी जी एक बार यात्रा पर निकले थे। उस दौरान उनके साथ अनुयायी आनंद स्वामी भी थे। यात्रा के दौरान आनंद स्वामी की एक व्यक्ति से किसी बात को लेकर बहस हो गई थी। बात बढ़ गई तो आनंद स्वामी ने उस व्यक्ति को थप्पड़ मार दिया। बाद में जब ये बात गांधी जी पता चली तो उन्हें बहुत बुरा लगा। उन्होंने आनंद स्वामी को उस व्यक्ति से माफी मांगने के लिए कहा। उन्होंने कहा कि अगर वो व्यक्ति आम इंसान न होकर आपके बराबरी का होता तो क्या आप तब भी थप्पड़ मारते। इसके बाद आनंद स्वामी को अहसास हुआ और उन्होंने उस व्यक्ति से माफी मांगी।

नकल करना अपराध

क बार गांधी जी के स्कूल में निरीक्षण के लिए निरीक्षक आए हुए थे। उनके शिक्षक ने विद्यार्थियों को हिदायत दे रखी थी कि निरीक्षक पर आप सबका अच्छा प्रभाव पड़ना चाहिए। जब निरीक्षक गांधी जी की कक्षा में आए तो उन्होंने परीक्षा लेने के लिए विद्यार्थियों को पांच शब्द बताकर उनकी वर्तनी लिखने को कहा। सारे बच्चे वर्तनी लिखने में लग गए। जब बच्चे वर्तनी लिख ही रहे थे कि शिक्षक ने देखा कि गांधी जी ने एक शब्द की वर्तनी गलत लिखी है। उन्होंने गांधी जी को संकेत कर बगल वाले छात्र से नकल कर वर्तनी ठीक लिखने को कहा। मगर गांधी जी ने ऐसा नहीं किया। उन्हें नकल करना अपराध लगा। निरीक्षक के जाने के बाद उन्हें शिक्षक से डांट खानी पड़ी।

फाई का सबक

क बार गांधी जी बिहार के चंपारण गए। उनके साथ पत्नी कस्तूरबा गांधी भी गई थीं। वहां उन्होंने जनता के अंदर चेतना जगाई। गांवों में स्कूल खोलने का काम शुरू किया। गांधी जी ने कस्तूरबा से कहा, 'तुम क्यों कोई स्कूल नहीं शुरू करतीकिसानों के बच्चों के पास जाओउन्हें पढ़ाओ?' कस्तूरबा बोलीं, 'मैं क्या सिखाऊंउन्हें क्या मैं गुजराती सिखाऊंअभी मुझे बिहार की हिंदी आती भी तो नहीं।इसके बाद गांधी जी ने कहा, 'बात यह नहीं है। बच्चों का प्राथमिक शिक्षण तो सफाई है। किसानों के बच्चों को इकट्ठा करो। उनके दांत देखो। आंखें देखो। उन्हें नहलाओ। इस तरह उन्हें सफाई का पहला पाठ तो सिखा सकोगी। मां के लिए ये सब करना कठिन थोड़े ही है। ये सब करते-करते उनके साथ बातचीत करोगी तो वे भी तुमसे बोलेंगे। उनकी भाषा तुम्हारी समझ में आने लगेगी और आगे जाकर तुम उन्हें ज्ञान भी दे सकोगीपर सफाई का पाठ तो कल से ही उन्हें देना शुरू करो।'

सिक्के का वास्तविक मूल्य

धी जी देश भर में भ्रमण कर चरखा संघ के लिए धन इकठ्ठा कर रहे थे। वे उड़ीसा में किसी सभा को संबोधित करने पहुंचे। उनके भाषण के बाद एक बूढ़ी गरीब महिला खड़ी हुईउसके बाल सफेद हो चुके थेकपड़े फटे हुए थे और वह कमर से झुक कर चल रही थीकिसी तरह वह भीड़ से होते हुए गांधी जी तक पहुंची। उन तक पहुंच कर उनके पैर छुए। फिर उसने अपनी साड़ी के पल्लू में बंधा ताम्बे का एक सिक्का निकाला और गांधी जी के चरणों में रख दिया। गांधी जी ने सावधानी से सिक्का उठाया और अपने पास रख लिया। उस समय चरखा संघ का कोष जमनालाल बजाज संभाल रहे थे। उन्होंने गांधी जी से वो सिक्का मांगालेकिन गांधी जी ने उसे देने से मना कर दिया। जमना लाल बजाज ने हंसते हुए कहा, 'मैं चरखा संघ के लिए हजारों रुपए के चेक संभालता हूंफिर भी आप मुझ पर इस सिक्के को लेकर यकीन नहीं कर रहे हैं।गांधी जी बोले, 'यह ताम्बे का सिक्का उन हजारों से कहीं कीमती है। यदि किसी के पास लाखों हैं और वो हजार-दो हजार दे देता है तो उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन ये सिक्का शायद उस औरत की कुल जमा-पूंजी थीजिसे उसने दान दे दिया। कितनी उदारता दिखाई उसने। इसीलिए इस ताम्बे के सिक्के का मूल्य मेरे लिए एक करोड़ से भी अधिक है।'

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