संत

71वें जन्मदिन पर शत् – शत् नमन

  • श्रवणबेलगोला के कुशल चित्रकार… स्वामी जी लेखक- स्वस्तिश्री क्षुल्लक अतुल्य सागर (वर्तमान में मुनि पूज्य सागर)

स तत् कर्मशील…, मौन संत…, स्वाभाविकता से परिपूर्ण…, शांत और सौम्य व्यक्तित्व…, सकारात्मक नजरिया… ये सभी विशेषताएं हैं परमपूज्य जगद्गुरु कर्मयोगी स्वस्तिश्री चारुकीर्ति भट्टारक स्वामी जी की। उनका जीवन एक  खुली किताब है, जिसमें अनुशासन, कर्त्तव्यनिष्ठा, दृढ़ संकल्प और विनम्रता की सुरभि से हर पन्ना महक रहा है।  उनके जीवन चरित्र के ये पन्ने आज हर आम व खास व्यक्ति को सहज ही आकर्षित करते हैं, तभी तो आज देश के हर कोने में उनके हजारों अनुयायी हैं। उनके व्यक्तित्व की पहचान उनके कार्य हैं और यही उनका परिचय भी। श्रीक्षेत्र श्रवणबेलगोला में उनके द्वारा किए गए विकास कार्य किसी से छिपे नहीं है और न ही उनके भट्टारक बनने से पूर्व  यहां की दशा। विगत 50 सालों में उन्होंने श्रीक्षेत्र ही नहीं, कर्नाटक प्रदेश के जैन समाज को संगठित रखकर दिशा देने के लिए जो भी कार्य किए हैं, वे काबिले तारीफ हैं। श्रवणबेलगोला की विकास प्रक्रिया और ख्याति को उच्चतम सोपान पर पहुंचाने के लिए किए गए प्रयासों की बानगी को देखते हुए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि स्वामीजी वर्तमान श्रवणबेलगोला के कुशल चितेरे हैं।

दीक्षा के चार माह बाद ही संभाली मठ की बागडोर

परम पूज्य स्वामीजी की जीवनयात्रा की ओर दृष्टिनिक्षेप करें तो पाएंगे कि संन्यास से पूर्व उनका नाम रत्नवर्मा था। सही मायने में वह कर्नाटक ही नहीं, समस्त जैन समाज के अनमोल रत्न हैं। जिनके मार्गदर्शन में आज कई संगठन और तीर्थक्षेत्रों का कार्य सुचारु रूप से चल रहा है। उनका जन्म 3 मई, 1949 को हुआ और 20 साल बाद 12 दिसंबर, 1969 को उन्होंने संन्यास दीक्षा ग्रहण की। तभी से वे सतत क्रियाशील हैं। दीक्षा के चार माह बाद ही उन्होंने 19 अप्रैल 1970 को श्रवणबेलगोला मठ की बागडोर संभाल ली। उन्होंने मैसूर से इतिहास में एम.ए., बैंगलोर विद्यापीठ से तत्वज्ञान में एम.ए. जैनागम का विशेष अध्ययन किया। उन्होंने हिंदी साहित्य विशारद और संस्कृत साहित्य विशारद किया। वे कन्नड़, मराठी, संस्कृत, प्राकृत, हिंदी, अंग्रेजी आदि भाषाओं के ज्ञाता हैं।

दूरदर्शी विकास और कुशल नेतृत्व के प्रेरक

परम पूज्य स्वामीजी के कुशल नेतृत्व और दूरदर्शी विकास योजना के कारण ही श्री क्षेत्र का व्यवस्थित ढंग से विकास संभव हो सका है। एक समय यहां के मंदिरों में सुचारू पूजन व्यवस्था तक नहीं थी, साधन कम थे और यात्रियों के ठहरने हेतु सुव्यवस्था भी नहीं थी। स्वामी जी के मठाधिपति बनने के बाद से यहां के विकास ने गति पकड़ी। सबसे पहले उन्होंने मंदिरों में पूजा व्यवस्था बनाई और श्रीक्षेत्र के करीब 40 मंदिरों व आस-पास के कई मंदिरों का जीर्णोद्घार करवाया। जैन मठ के ऊपर 100 वर्ष पुराने त्रिभुवन तिलक पार्श्वनाथ जिनमंदिर का जीर्णोद्धार देखने लायक है। मंदिर में तोड़-फोड़ किए बिना उसके स्वरूप को और पुरातात्विक महत्व को बदले बगैर इतना सुंदर कार्य हुआ है कि देखते ही बनता है। यह कार्य सभी के लिए एक मिसाल है। स्वामीजी के प्रयासों से यहां के सभी मंदिरों में नित्यपूजा की उत्तम व्यवस्था की गई है। यात्रियों को ठहरने, भोजन आदि की भी अब यहां उत्तम व्यवस्था है। साधु-संतों के हेतु अलग से रहने की व्यवस्था है। त्यागी भवन, राजा श्रेयांस भवन आदि में साधुओं के चौैके लगाने हेतु भी सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं। ऐसा किसी अन्य तीर्थक्षेत्र में देखने को नहीं मिलता। स्वामी जी देश में ही नहीं, विदेशों में भी जैनधर्म की प्रभावना करते रहे हैं। वे वहां भी धर्मप्रचार हेतु प्रवास कर चुके हैं। अमेरिका, अफ्रीका, इंग्लैंड,  बर्मा, थाईलैंड आदि देश जा चुके हैं। वर्ष 1988 में इंग्लैंड के लेस्टर शहर में भगवान बाहुबली की 7 फुट ऊंची प्रतिमा की प्रतिष्ठापना उन्हीं के मार्गदर्शन में हुई थी। फरवरी 2011 में उन्होंने श्री क्षेत्र में एक रत्नत्रय जिन मंदिर बनवाया, जिसमें प्राचीन रत्नों की प्रतिमाएं विराजित की जाएंगी। इस मंदिर की भव्यता अनोखी है।      

महामस्तकाभिषेक के विराट आयोजन

यह स्वामी जी के कुशल और दूरदर्शी नेतृत्व का ही परिणाम है कि 12 वर्ष के अंतराल पर नियमित रूप से महामस्तकाभिषेक जैसे तीन विराट आयोजन सफलता पूर्वक सम्पन्न हुए हैं। वर्ष 1981, 1993, 2006, 2018 के महामस्तकाभिषेक के बाद स्वामी जी ने क्षेत्र में विकास हेतु नई पहल की।  
वर्ष 1981 में पहले महामस्तकाभिषेक के पूर्व जनमंगल कलश इसी आयोजन के निमित्त दिल्ली से प्रस्थान कर पूरे देश में घूमता हुआ यहां पहुंचा था, जो आज भी स्मारक स्वरूप स्थापित है। महामस्तकाभिषेक के बाद जैन ज्ञान प्रचारक संघ की स्थापना हुई, जिसके तहत स्कूल-कॉलेज खोले गए। गोम्मटेश्वर जनकल्याण ट्रस्ट की स्थापना हुई और इसमें विभिन्न जनकल्याण के कार्य किए जाते हैं।

फिर 1993 में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ प्राकृत एवं रिसर्च सेंटर खुला, जहां पांडुलिपियों ताड़पत्रों के संरक्षण, ग्रंथों के अनुवाद और प्रकाशन आदि कार्यों के लिए कार्य प्रारंभ हुए। इसके बाद चन्द्रगिरि और विंध्यगिरि पर्वतों के महाद्वारों का निर्माण करवाया गया।
तीसरे महामस्तकाभिषेक, 2006 के बाद बाहुबली बाल चिकित्सालय खुला।
वर्ष 2018 के महामस्तकाभिषेक के अवसर पर समाज को 100 बिस्तर का जनरल अस्पताल और प्राकृत विश्वविद्यालय की सौगात मिलने वाली है। इस प्रकार क्षेत्र को हर महामस्तकाभिषेक के बाद एक अमूल्य सौगात मिली, जो यहां की विकास यात्रा के मील के पत्थर हैं।      

समाजसुधार और समाजसेवा पर दूरदर्शी नजर

श्रीक्षेत्र पर जो भी विकास और समाज सेवा के कार्य चल रहे हैं, वे सब स्वामी जी की ही लगन और कर्मठता का प्रतीक हैं। यहां के विभक्त हुए समाज को एकजुट कर उन्होंने जरूरतमंदों के लिए नि:शुल्क चिकित्सालय की भी स्थापना कराई। आस-पास के ग्रामीणों को भी स्वास्थ्य लाभ देने हेतु कई योजनाएं चलाई गई हैं। जिनमें से एक है, मोबाइल चिकित्सालय। यह आस-पास के दस गांवों में नियमित रूप से क्रमवार पहुंचता है और लोगों का उपचार करता है। समय-समय पर नि:शुल्क स्वास्थ्य परीक्षण, नेत्र परीक्षण और दंत चिकित्सा के शिविर लगाए जाते हैं, जिसमें लोगों का नि:शुल्क उपचार होता है। यहां स्वामी जी कई जनकल्याणकारी योजनाएं भी चलाते हैं, जिनमें जैन-जैनेत्तर सभी वर्गों को सहायता दी जाती है। विकलांगों को ट्राइसाइिकल, कैलीपर्स, जयपुर पैर(कृत्रिम पैर) व गृहिणियों को सिलाई मशीन भी नि:शुल्क वितरित की जाती है। यहां आने वाला जरूरतमंद कभी खाली हाथ नहीं लौटता। स्वामीजी समाज कल्याण में भी क्षेत्र को अग्रणी बनाए हुए हैं। लोगों को संगठित करने के लिए विभिन्न आयोजन भी यहां कराए जाते हैं। श्रीक्षेत्र से कन्नड़ गोम्मटवाणी नाम से पाक्षिक समाचार पत्र का प्रकाशन भी हो रहा है।

जैन साहित्य का संरक्षण

परम पूज्य स्वामीजी ने जैन साहित्य के प्रचार-प्रसार और उनके संरक्षण के प्रयासों को भी बड़ी रुचि के साथ किया है। जैन साहित्य उनकी विद्वत्ता और समर्पित प्रयासों के कारण यहां फल-फूल रहा है। आने वाले समय में स्वामी जी यहां प्राकृत विश्वविद्यालय खोलने के इच्छुक हैं और इसके लिए प्रस्ताव विचाराधीन है। यदि विश्वविद्यालय को मंजूरी मिल जाती है तो यह जैन साहित्य और उसके संवर्धन के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।

समृद्ध शिष्य परंपरा के वाहक स्वामीजी

परम पूज्य स्वामी जी से ही दीक्षित करीब 9 भट्टारक अलग-अलग मठों की बागडोर संभाले हुए समाज का मार्गदर्शन कर उन क्षेत्रों के विकास हेतु प्रतिबद्घ हैं।

स्वामीजी के शिष्य…

  • परम पूज्य कारकल मठ के स्वस्तिश्री ललितकीर्ति भट्टारक स्वामी
  • परम पूज्य कनकगिरी जैन मठ के स्वस्तिश्री भुवनकीर्ति भट्टारक स्वामी
  • कम्ब्दहल्ली जैन मठ के परम पूज्य स्वस्तिश्री भानुकीर्ति भट्टारक स्वामी
  • अर्हतगिरि जैन मठ के परम पूज्य स्वस्तिश्री धवलकीर्ति भट्टारक स्वामी
  • मूडबद्री जैन मठ के वर्तमान परम पूज्य स्वस्तिश्री चारुकीर्ति भट्टारक स्वामी
  • हुमचा पद्मावती जैन मठ के परम पूज्य स्वस्तिश्री देवेन्द्रकीर्ति भट्टारक (धर्मकीर्ति) स्वामी
  • नरसिंहराजपुर (ज्वालामालिणी) मठ के परम पूज्य लक्ष्मीसेन भट्टारक स्वामी जी
  • सौन्दा मठ के परम पूज्य स्वस्तिश्री भट्टाकलंक भट्टारक स्वामी जी
  • अरतिपुर के पट्टविचारक क्षुल्लक सिद्धंातकीर्ति स्वामी जी

दिगंबर जैन समाज की लगभग सभी संस्थाएं स्वामी जी के पास मार्गदर्शन हेतु आती हैं और उन्हीं के अनुसार कार्य करती हैं। बीजापुर सहस्त्रफणी पार्श्वनाथ मंदिर, नल्लुर समवशरण मंदिर, मकुर्ल आदिनाथ मंदिर, शालीग्राम भक्तामर मंदिर, आर्सिकेरी सहस्त्रकूट जिनालय व मायसंद्रा मंदिर के वे गौरव अध्यक्ष हैं, जहां के सभी कार्य उन्हीं के मार्गदर्शन में होते हैं। परम पूज्य स्वामी ने 1997 से अपनी चर्या में चातुर्मास चर्या को शामिल किया है। तब से अब तक आप 16 चातुर्मास कर चुके हैं। सामाजिक कार्यों व मठ के दायित्वों को निभाते हुए आप आध्यात्मिक और आत्मिक साधना को भी पूरा समय देते हैं। प्रतिवर्ष मौन साधना, ध्यान, अध्ययन, स्वाध्याय नियमित तौर पर करते हैं। तप और त्याग भी साथ-साथ चलता रहता है।
वर्ष 1997 के बाद से उन्होंने गाड़ी का प्रयोग कम किया और 2002 से 2009 तक तो उन्होंने पद विहार ही किया। स्वामी जी के गाड़ी त्याग के पीछे एक महत्वपूर्ण कारण था। इस दौरान उनके मार्गदर्शन में विद्वानों ने धवला, जयधवला और महाधवला के 40 भागों का कन्नड़ में अनुवाद किया। स्वामी जी ने इन सभी का संपादन किया है। इसमें से 21 का प्रकाशन हो चुका है और बाकी प्रकाशन की प्रक्रिया में है। कार्य पूर्ण होने के बाद भी वह केवल अत्यावश्यक कार्यों के लिए बाहर जाने पर ही गाड़ी का प्रयोग करते हैं अन्यथा यहां तो पदविहार ही करते हैं।
वर्ष 2001 से फोन पर बात करने का उन्होंने त्याग किया है। इतने व्यस्त कार्यक्रमों और इतनी बड़ी जिम्मेदारियों को निभाने के बावजूद फोन के बिना सभी कार्य सुचारू रूप से चलाना अपने आप में एक विलक्षण गुण है। ऐसे बहुमुखी प्रतिभावान, गुणी और विनम्र भट्टारक जी के ही कारण श्रीक्षेत्र की पहचान आज चहुंओर है। यहां आने वाले अतिथि, यात्री, त्यागी व संत सभी इनके आत्मीय स्वागत और उत्तम व्यवस्थाओं से अभिभूत होकर प्रसन्नचित्त लौटते हैं। मठाधिपति के पद पर आसीन होकर विनम्रता का भाव लिए यह सहज व्यक्तित्व हर आम और खास के लिए प्रेरणा का स्त्रोत है। हम सभी को स्वामी जी से समर्पण, श्रद्घा, लगन और निष्ठा सीखनी होगी, तभी तो समाज को एक माला में पिरोकर धर्म रक्षा, तीर्थ रक्षा, संत रक्षा और देश रक्षा का फर्ज पूरा कर सकेंगे।
विश्व शांति के लिए कार्य करने पर 2017 में कर्नाटक सरकार ने स्वामी जी को महावीर शांति पुरस्कार से नवाजा है। इसके तहत 10 लाख रुपए, प्रशस्ति, शॉल और श्रीफल देकर सम्मानित किया गया है।

परम पूज्य स्वसती श्री जगदगुरू चारूकीिर्तभट्टारक स्वामी जी

  • स्वस्ति श्री जगतगुरु चारूकीिर्त भट्टारक स्वामी जी का जन्म 3 मई, 1949 को हुआ।
  • उन्होंने 19 अप्रैल, 1970 में 21 साल की उम्र में श्रवणबेलगोला मठ के प्रमुख का पद सं्भाला।
  • वह कन्नड़, संस्कृत और प्राकृत भाषा के विद्वान हैं। मैसूर और बंगलौर विश्वविद्यालयों से इतिहास और दर्शन में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त कर चुके हैं।
  • 1981 में उन्हें तत्कालीन प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी से कर्मयोगी टाइटल मिला, जब वह महामस्तकाभिषेक में सम्मिलित हुईं।
  • यह अपनी तपस्या और विनम्रता के लिए जाने जाते हैं, स्वामी जी अपने करिश्माई व्यक्तित्व द्वारा अपने भक्तों को आकर्षित करते हैं। धार्मिक गतिविधियों के साथ उनका ध्यान स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में हमेशा समाज के विकास का विकास रहा है।

मैं और मेरा श्रवणबेलगोला

अन्तर्मुखी मुनि श्री 108 पूज्य सागर महाराज

मे रा श्रवणबेलगोला से िरश्ता वर्ष 2000 से है। जब कर्मयोगी स्वस्तिश्री चारूकीर्ति भट्टारक स्वामी जी से पहली बार धरियावद में मिलना हुआ। पहली मुलाकात में स्वामी जी से पिता जैसा प्यार मिला। यह वाकया मैं कभी नहीं भूलूंगा। धरियावाद में मेरा स्वास्थ्य खराब हो गया था। तब स्वामी जी ने जयपुर के सुशील जी वैद्य को एक पत्र लिखवाया और उपचार करने को कहा। उस समय मुझे महसूस हुआ कि धर्म के मार्ग पर एक पिता जैसा मार्गदर्शन करने वाला मुझे मिल गया है। िफर 2001 में पहली बार श्रवणबेलगोला जाने का अवसर मिला। वहाँं जाते ही लगा, जैसे पिता कि छत्र-छाया के साथ ही मां का प्यार भी मिल गया। स्वामी जी मेरे लिए पिता तुल्य हैं तो श्रवणबेलगोला मां के समान। इन दोनों के चलते ही मैं प्रेम साधना, अध्यात्म, सामाजिक और लौकिक व्यवहार में मजबूत बन पाया। श्रवणबेलगोला की धरती और कर्मयोगी स्वस्तिश्री भट्टारक चारूकीर्ति की छत्र-छाया में संस्कार और संस्कृति के ज्ञान से वो अनुभव प्राप्त हुए, जिससे मैं अपने आपको निर्मल बना पाया और मुनि पद को प्राप्त कर सका। इन्हीं की वजह से मैं अपनी पहचान बना पाया हूं। इन दोनोंं की अंगुली पकड़कर चलना सीखा है। अगर यह कहूं िक श्रवणबेलगोला मेरी हर श्वांस में बसा है तो कोई आश्चर्य की बात नही है। इन दोनों से जुड़े साथ, सुख-दुख, अनुभव और साधना की यादें आप से साझा कर रहा हूं। इन अनुभवों को शब्दों में बांधा नहीं जा सकता। पिता तुल्य स्वामी जी ने एक बार बुलाकर कहा कि अब से तुम अपने हाथों से भोजन बनाकर खाओगे। तब मुझे खाना बनाना नहीं आता था। सच पूछो तो उस समय मन में ‘यह कौन सी नई मुसीबत आ गई सिर पर’। दो-तीन दिन तक तो आटा सेंककर खाया। धीरे-धीरे मंूगफली की चटनी से पूड़ी खाने लगा। कभी-कभी दाल में बाटी डालकर खा लेता। रोटी तो भारत के नक्शे जैसी बनाता था। पकाते वक्त कई बार हाथ जल जाते तो कभी छाला पड़ जाता। धीरे-धीरे सब बनाना सीख गया। कुछ समय बाद समझ आया कि स्वाद की आसक्ति नहीं रहे, इसलिए पिता ने यह सब करवाया है। जैसे एक पिता अपनी बेटी को ससुराल भेजने से पहले िसखाता है, कुछ-कुछ वैसे ही मुझे भी स्वामीजी ने सिखाया। श्रवणबेलगोला की भण्डारा बसदि गवाह है, यहीं से विचार और चिंतन शक्ति को पंख मिले। एक दिन मैंने स्वामी जी से शिकायत की। मैंने कहा, ‘आप पढ़ाते तो हो नहीं तो मैं यहां रुककर क्या करूं?’ स्वामी जी ने सीधे कोई जवाब नहीं दिया। हां, कुछ देर बाद बोले, देखो वह चिड़िया आकाश में उड़ रही है। उसके बच्चे उसके पीछे उड़ रहे हैं। चिड़िया अपने बच्चों को अन्न लाकर देती है, रहने को घोंसला बना कर देती, लेिकन उड़ना नहीं सिखाती। बच्चे देख-देखकर खुद सीख जाते हैं। सच बताऊं तो उस समय कुछ खास समझ नहीं आया। जब समझ आया तो जान पाया, आखिर स्वामीजी क्या चाहते हैं। यानी गुरु को देख कर सीखो कि वह क्या करते हैं, कैसे पढ़ते-बोलते हैं। ऐसी कई बाते हैं मेरे जीवन की जो पिता तुल्य स्वामी जी और मां तुल्य श्रवणबेलगोला से जुड़ी हैं। मेरे उद्भव का गवाह है श्रवणबेलगोला का हर एक मन्दिर और मेरी साधना का साक्षी भी। जब बीती बातें याद आती थीं तो मैं यहां के मन्दिरों में चला जाता था और यहां का हर मंदिर मुझे सदैव दुख में भी मुस्कुराहट बनाए रखने का संकेत करता था। त्याग, तप को अंगीकार करने के लिए वहां का हर कण मुझे प्रेरणा देता रहा है। जीवन के हर अच्छे कार्य की शुरुआत या कल्पना यहीं से शुरू हुई है, अंत भले ही कहीं भी हुआ हो। बच्चा अच्छे संस्कार धारण करता है या ज्ञान का अर्जन कर उसका सदुपयोग करता है और जीवन में सफलता प्राप्त करता है तो उसके पीछे सबसे अधिक मेहनत पिता की होती है। ठीक उसी तरह से मेरी सफलता के पीछे खड़े हैं स्वामी जी। उनके सहयोग के बिना सफलता मिलना लगभग नामुमकिन था। श्रवणबेलगोला के लिए जितना भी लिखा जाए, वह कम ही होगा। शायद मैं कभी पूरा लिख भी नहीं पाऊंगा क्योंकि माता-पिता के उपकार को शब्दों में कभी नहीं बांधा जा सकता। फिर भी जो कुछ थोड़ा-बहुत मैं लिख पाया हूं, वह अपना कर्त्तव्य समझ कर ही लिखा है। मेरी भावना है कि मैं अपने माता-पिता का जगत के सामने कुछ तो गुणगान कर सकूं। मैंने जो कुछ भी लिखा है, यह वही सब है, जो या तो सुन-सुनकर मन में रह गया या फिर कुछ ऐसा संकलन है, जो मेरे माता-पिता के बारे में आचार्यों और विद्वानों ने कभी लिखा है। अंत में मैं यही कहना चाहता हूं कि श्रवणबेलगोला मेरी श्वांस में बसा है, मेरी यादों में है, यही मेरी कर्म भूमि है। इसी ने धर्म के क्षेत्र में मुझे छोटे से बड़ा किया है। एक नई पहचान भी यहीं से मिली है मुझे। वैसे भी पुत्र की पहचान तो माता-पिता से ही होती है, चाहे वह कहीं भी चला जाए। बस मेरी भी यही स्थिति है। जब मैं मुनि बनकर 9 दिसम्बर 2017 में वापस यहां आया तो बहुत कुछ बदल गया था। यह देखकर बहुत खुशी हुई कि पिता तुल्य स्वामी जी के मार्गदर्शन और सािन्नध्य में मां तुल्य श्रवणबेलगोला सजकर तैयार है… यहां आने वाले धर्म मार्ग पर चलने वाले यात्रियों के स्वागत के लिए।

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