आलेख

दीपावली पर्व हमारे अंतस में उम्मीद का दीया जलाता है -डाॅ. सुनील जैन ‘संचय’, ललितपुर

धार्मिक और सामाजिक दृष्टि से जैसी महत्ता और व्यापकता दीपावली पर्व की है वैसी और किसी पर्व की नहीं। संभवतः इसीलिए दीपावली को सबसे बडे़ उत्सव की संज्ञा दी जाती है। यह एक ऐसा अनूठा पर्व है जो सबको उत्सवधर्मिता से जोड़ता है। हमारी सांस्कृतिक चेतना से जुड़ा यह पर्व हमारे अंतस में उम्मीद का दीया जलाता है।
 दीपावली पर दीपक जलाते समय दीपक के सच को समझना आवश्यक है। अन्यथा दीपावली की प्रकाशपूर्ण रात्रि के पश्चात् केवल बुझे हुए मिट्टी के दीपक हाथों में रह जाएंगे, आकाशीय अमृत-आलोक खो जाएगा। दीपक का सच उसके स्वरूप में है। दीपक मरणशील मिट्टी का होकर भी ज्योति को धारण करता है। दीपक जलता है, आलोक बिखरेता है और तत्पश्चात अपनी मरणशील मिट्टी में समा जाता है। मोल जलते हुए प्रदीप्त दीपक का होता है। बुझे दीपकों का मोल नहीं होता। दीपक का तात्पर्य है- अपनी वर्तिका में अग्नि को धारण कर प्रकाश बिखेरना। यह घटना असाधारण हैै।
यह भी सच है कि समय के साथ पर्व मनाने के तरीके भी बदले हैं और बाजार की चकाचैंध में उत्सवों की मूल धारणा कहीं पीछे छूटती जा रही है और समृद्धि तथा वैभव का उसकी जगह ले रहा है। दीपों का यह पर्व उन धार्मिक मान्यताओं का भी उत्सव है जो आध्यात्मिकता की ओर ले जाती हैं और आध्यात्मिकता की ओर जाने की पहली निशानी यही है कि समाज में मैत्री भाव दिख रहा है या नहीं? यह दीप पर्व इस मैत्री भाव को उतरोत्तर बढ़ाए, यह सबकी कामना भी होनी चाहिए और कोशिश भी।
यह पर्व हमें एहसास कराता है कि आज भी देश में बहुत से ऐसे लोग हैं, जिन्हें दो वक्त का भोजन भी नहीं मिलता। उनके घरों तक बेशक कुछ सरकारी सुविधाएं अब पहंुच रहीं हैं, लेकिन उनकी जिंदगी में खुशियों के क्षण कम ही हैं। कोरोना संक्रमण के दौर से हम सभी गुजर रहें हैं, इस दौर में हजारों लोगों की आजीविका पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। इस वर्ष दीपावली पर्व पर हमें हमारी उदारता का परिचय देते हुए एक दीपक उन बेसहारा लोगों की मदद के लिए जलाना होगा जो कोविड के कारण संकट से जूझ रहे हैं। दरअसल पर्वों, त्योहारों की अपनी सामाजिकता है, जो हमें थोड़ा और उदार बनाती है और आपस में जोड़ती है। अपने साथ औरों की और पूरे परिवेश की चिंता लोगों को न केवल समरसता और सद्भाव से भरती है, बल्कि एक बेहतर समाज का निर्माण भी करती है। चूंकि हर किसी की यही चाह है कि एक बेहतर समाज का निर्माण हो इसलिए इससे बेहतर और कुछ नहीं कि दीपावली के मूल संदेश को न केवल आत्मसात् किया जाए, बल्कि यथासंभव उसका प्रसार भी किया जाए।
यह पर्व समाज में सद्भाव तथा रोशनी फैलाने का पर्व है। क्यों न हम इस दीपावली पर प्रेम का एक दीया जलायें और हमारे आसपास के माहौल और पर्यावरण को बेहतर बनाने का संकल्प लें। प्रदूषण हमारी जीवन पद्धति में प्रवेश कर चुका है। उससे मुक्ति के लिए घोर साधना करने की जरूरत है। कोरोना विशेषज्ञों का मानना है कि वातावरण को दुरूस्त रखना होगा वरना संक्रमण बढ़ सकता है। ऐसे में पटाखे फोड़े जाने से वातावरण खतरे में पडे़गा। हवा में फैलने वाले बारूद के विषाक्तकण कोरोना संक्रमण का खतरा बढ़ा सकते हैं। वायु प्रदूषण श्वांस की तकलीफ बढ़ायेगा। इस बार हमें संकल्प लेना होगा कि आतिशबाजी बिल्कुल नहीं करेंगे। जो राशि हम आतिशबाजी में व्यय करते हैं वह राशि हम कोरोना के कारण संकट से जूझ रहे लोगों की मदद में लगायें।
दीपावली आज भी स्वच्छता, सौंदर्य, समृद्धि का ही प्रतीक है, किंतु आज यह मलिनता, संकीर्णता और प्रदूषण के  खिलाफ शाब्दिक साधना की मांग कर रही है। अपने वास्तविक रूप में मनाएं जाने की मांग कर रही है।
दीपावली की अनेक पौराणिक कथाएं हैं। इस दिन भगवान राम आतंक के महापर्याय रावण का वध करके जब अयोध्या नगरी लौटे तो उनका स्वागत प्रकाश महोत्सव के रूप में हुआ। उस दिन हर आंगन में दीपों की कतार लगाई गई। जैनधर्म के अनुसार इस दिन जैनधर्म के वर्तमान शासनायक तीर्थंकर महावीर स्वामी को निर्वाण (मोक्ष) की प्राप्ति हुई थी और गौतम गणधर को केवलज्ञान की उपलब्धि प्राप्त हुई थी। इस अवसर पर जैन समुदाय विधि विधान पूर्वक निर्वाण लाडू चढ़ाकर और दीपक प्रज्जवलित कर अपनी खुशी का इजहार करता है।


यद्यपि दीप पर्व से अनेक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं, लेकिन उन सबके मूल में यही भाव है कि सभी सुखी एवं समृद्ध हों और अंधकार से प्रकाश की ओर बढें़। यह प्रकाश अमावस की रात झिलमिलाती रोशनी भर नहीं, बल्कि वैभव के साथ-साथ ज्ञान एवं विवेक के आलोक का पर्याय भी है। ऐसा ही प्रकाश अज्ञानता, असामनता, अभाव, अहंकार, अशांति, अन्याय, आतंक के अंधकार को दूर कर सकता है। यह आसानी से तब दूर होगा जब समाज का नेतृत्व करने वाले पहले खुद को आत्मिक ज्ञान से प्रकाशित करें। ऐसा करने का सीधा अर्थ है अपने अंतस के कलुष को मिटाना। दीपावली पर्व से जुड़ीं अनेक  पौराणिक कथाओं से हम सभी सुपरिचित हैं, परंतु परिचय की इस लंबी प्रक्रिया में हम इस महापर्व के गहरे मर्म से अपरिचित रह जाते हैं।
मिट्टी के दीपक में मनुष्य की जिंदगी का बुनियादी सच समाया है। ऐसा सच जो हमारा अपना है। ऐसा सच जिसमें हमारा अनुभव पल-पल धड़कता है। यह सच ही हमारी धरोहर एवं थाती है, जो कहती है कि तुम स्वयं ज्योतिस्वरूप हो, आत्मस्वरूप हो। अपने अंदर की ओर झांको! अंतर्यात्रा करो!! अंदर में ही सब कुछ समाया हुआ है। दीपक की भांति मनुष्य की देह भी मिट्टी ही है, किंतु उसकी आत्मा मिट्टी की नहीं है। वह तो इस मिट्टी के दीपक में जलने वाली अमृत ज्योति है। हालांकि, मनुष्य लोभ, मोह, मद, अहंकार की मोटी परतों में दब कर अपने मूल स्वरूप को भूला बैठा है। वह स्वयं को मात्र मिट्टी की देह समझ बैठा है और मिट्टी की इस देह का श्रृंगार करने में इतना अलमस्त हो गया है कि आत्मज्योति का चिरंतन सच अंधकार में कहीं खो गया है। दीपक की मिट्टी में जब तक ज्योति न उतरे वह अपनी सचाई से वाकिफ नहीं हो सकता, ठीक वैसे ही जैसे कि हम अपने वास्तविक स्वरूप से दूर-दूरतम रहने के कारण इंद्रियों से विनिर्मित देह में विचरण करने लगते हैं और इस भ्रम को सच मान लेते हैं।  भ्रम का यह आवरण हमें सघन अंधकार में जीने को विवश करता है। इससे जिंदंगीं की घुटन और छटपटाहट फिर से तीव्र और घनी हो जाती है।
हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी दीपावली धूमधाम से मनाई जाएगी। दीप जलाए जाएंगे। मिठाइयां बांटी जाएंगी। नए-नए अलंकार एवं परिधानों का उपयोग किया जाएगा। श्रृंगार अपनी चरम सीमा को स्पर्श करेगा। उमंग एवं प्रकाश से मिश्रित इस महोत्सव में ऐसा होना तो समृद्धि का प्रतीक है लेकिन हम आत्म-समृद्धि की ओर भी कदम बढ़ाये ंतो हमारा अन्तर्वैभव भी जगमगा उठेगा। कोविड के इस दौर ने हमें बहुत कुछ सिखाया है इसलिए अब तो एक आत्म-दीप जलाओ।
-(लेखक स्तंभकार व आध्यात्मिक चिंतक हैं)
-ज्ञान-कुसुम भवन, नेशनल कान्वेंट स्कूल के पास, गांधीनगर, नईबस्ती
ललिलतपुर 284403 उ0प्र0 9793821108 ईमेल:  

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