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महावीर जयंती पर मुनि दीक्षा व महावीर निर्वाण उत्सव पर समाधि का अद्भुत योग – राजेन्द्र जैन महावीर, सनावद

सामाजिक सरोकार के निस्पृही संत सराकोद्धारक आचार्यश्री ज्ञानसागरजी महाराज की समाधि अपूरणीय क्षति

आचार्यश्री शांतिसागरजी महाराज छाणी महाराज की परम्परा के षष्ठ पट्टाचार्य, सराकोद्धारक राष्ट्रसंत आचार्यश्री ज्ञानसागरजी महाराज की समाधि 15 नवंबर 2020 (भगवान महावीर निर्वाण दिवस दीपावली) की शाम 6 बजे श्री शांतिनाथ दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र नसियाजी बारां (राजस्थान) में हो गई। वे यहां वर्ष 2020 का वर्षायोग कर रहे थे । श्री मुनिसुव्रतनाथ दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र जहाजपुर (राजस्थान) में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा के बाद वे मार्च 2020 से बारां राजस्थान में विराजमान थे। यहीं उनका वर्षायोग 14 नवंबर 2020 को ही संपन्न हुआ था । 15 नवंबर को भगवान महावीर का निर्वाण उत्सव उनके सान्निध्य में सानंद संपन्न हुआ।  सायं 5 बजे आचार्यश्री ने अपनी दिनचर्या अनुरुप कार्य संपन्न किया।  बारां के श्रावकों ने उनसे आशीर्वाद प्राप्त किया और आचार्यश्री नियमित प्रतिक्रमण के लिए अपने कक्ष में विराजमान थे। उसी समय उन्हें संभवतः साइलेंट अटैक आया जिससे वे समाधि को प्राप्त हो गए। उल्लेखनीय तथ्य है कि आचार्यश्री की दीक्षा भगवान महावीर जयंती पर 31 मार्च 1988 को सोनागिर में हुई थी और उनकी समाधि भगवान महावीर के निर्वाण महोत्सव 15 नवंबर 2020 को हुई।  
 आचार्य सुमतिसागरजी महाराज के प्रिय शिष्य का जन्म मध्यप्रदेश के मुरैना नगर में 1 मई 1957 को हुआ था। श्रावक श्रेष्ठी श्री शांतिलालजी – अशर्फीदेवीजी जैन के यहां आपका जन्म हुआ था। बचपन से सांसारिक वैराग्य को धारण करते हुए आपने 1974 में संत शिरोमणि आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज से राजस्थान के अजमेर जिले में ब्रह्मचर्य व्रत लिया था।  5 नवंबर 1976 को सिद्धक्षेत्र सोनागिरिजी में आचार्यश्री सुमतिसागरजी ने उन्हें क्षुल्लक दीक्षा प्रदान कर गुणसागर नाम दिया था। इसके उपरांत सन् 1988 में महावीर जयंती 31 मार्च को उन्हें सोनागिरजी में मुनि दीक्षा प्रदान की गई और वे मुनि ज्ञानसागरजी महाराज के नाम से प्रसिद्ध हुए। 1989 में सरधना जिला मेरठ (उ.प्र.) में उन्हें उपाध्याय पद पर प्रतिष्ठित किया गया।  2013 में उन्हें अतिशय क्षेत्र बड़ागांव (उ.प्र.) में पंचम पट्टाचार्य विद्याभूषण सन्मति सागरजी के उपरांत छाणी परम्परा का षष्ठ पट्टाधीश आचार्य घोषित किया गया था ।
अहिंसा, शाकाहार, सामाजिक सरोकार के साथ प्रणी मात्र के प्रति संवेदनशील होकर अपनी चर्या में दृढ़ रहने वाले दिगम्बर मुनि के रुप में आपने उत्तर-दक्षिण-पूर्व-पश्चिम में संपूर्ण भारत की पद यात्रा की। आपके 43 वर्ष के दीक्षाकाल में वार्षिक जैन प्रतिभा सम्मान समारोह, इंजीनियर्स सम्मेलन, डाॅक्टर्स सम्मेलन, अभिभाषक सम्मेलन, प्रशासनिक/पुलिस अधिकारियों का सम्मेलन, पत्रकार सम्मेलन, कर्मचारी/अधिकारी सम्मेलन, जैन विधायकों एवं सांसदों का सम्मेलन, वैज्ञानिक सम्मेलन, सी.ए.कांफ्रेस, बैंकर्स कांफ्रेंस, सराक सम्मेलन, ज्योतिषी सम्मेलन, एकेडमिक एडमिनिस्ट्रेटर कांफे्रंस, आई.आई.टी.छात्र सम्मेलन, जैन कॅरियर काउंसलिंग आदि के सफल आयोजन होते रहे। कोरोना संकट के दौरान भी जूम एप एवं गूगल मीट के माध्यम से कई आयोजन संपन्न हुए।
बिछड़े हुए जैन जिन्हें सराक कहते है उन्हें अपना भाई बनाकर श्रावक बनाने का काम आचार्यश्री ने किया इस कारण उन्हें सराकोद्धारक के नाम से जाना जाता है। झारखण्ड बिहार के भीषण जंगल तड़ाई सराक क्षेत्र पेटरवार, रांची, गया आदि जगह उन्होंने ऐसे स्थानों पर चातुर्मास किए जहां रहने के लिए मात्र झोपड़ी ही थी और अनेक सराक बंधुओं को उनका मूल धर्म जैन श्रावक बताकर उन्हें जैन धर्म में शिक्षा-दीक्षा प्रदान की, जो कि उनका ऐतिहासिक कार्य था। वे सामाजिक सरोकारों से जुड़े हुए थे और जैन एकता के प्रबल पक्षधर थे। उन्होंने सोसायटी फाॅर सराक वेलफेयर एण्ड डेवलपमेंट मेरठ, श्री दिगम्बर जैन सराकोत्थान समिति गाजियाबाद, अखिल भारतीय दि.जैन सराक ट्रस्ट, संस्कृति संरक्षण संस्थान दिल्ली, श्रुत संवर्धत संस्थान मेरठ, ज्ञानसागर साइंस फाउण्डेशन दिल्ली, ज्ञान गंगा शाकाहार समिति दिल्ली, ज्ञान प्रतिभा संस्थान सूर्यनगर गाजियाबाद, श्रमण ज्ञान भारती मथुरा, गुरु ज्ञान सागर भारतीय सामाजिक संस्थान, देवबंद सहारनपुर सहित अनेको संस्थाओं के गठन में अपना आशीर्वाद एवं मार्गदर्शन प्रदान किया साथ ही जिन आगम के चारों अनुयोगों के ग्रंथों को छपवाकर अनेक स्थानों पर भिजवाया।
आपकी प्रेरणा से अनेक पुरस्कार भी प्रदान किए जाते थे जिसमें ज्ञानसागर साइंस फाउण्डेशन द्वारा जैन लोरेट पुरस्कार भी दिया जाता रहा है। जैन धर्म पर अनुसंधान करने वाले देश एवं विदेश के अनेक विद्वानों को पुरस्कार प्रदान कर उन्हें देश-विदेश में भेजने का काम भी आप करते थे। आपकी प्रेरणा से जेलों में कैदियों का हृदय परिवर्तन हुआ। आपके प्रवचनों से प्रभावित होकर अनेक खतरनाक अपराधियों ने अहिंसा धर्म को अपनाने का निश्चय किया था । पुलिस लाईन, न्यायालय, इंजीनियरिंग काॅलेज, मेडिकल काॅलेज, विश्वविद्यालय, बीएसएफ,  मिलिट्री कैंप सहित अनेकों जगह आपके प्रवचन समाज के लिए प्रेरणादायी होते थे ।
इसके अतिरिक्त आपकी प्रेरणा से जनहित के कार्य जैसे स्वास्थ्य परिक्षण, रोग निदान, तनाव मुक्ति, व्यसन मुक्ति षिविर आदि का आयोजन कर पीड़ित मानवता के प्रति सेवा की प्रेरणा भी आपके द्वारा दी जाती रही है। आपके द्वारा 14 समाजजनों को मुनि आर्यिका एवं क्षुल्लक दीक्षा प्रदान की गई। आपके मार्गदर्शन में प्रषम मूर्ति आचार्यश्री शांतिसागरजी छाणी महाराज का समाधि हीरक महोत्सव 2019-20 में आयोजित किया गया जिससे छाणी परंपरा की प्रसिद्धी संपूर्ण देश भर में हुई । देश को विभिन्न माध्यमों से अपनी प्रेरणा प्रदान करने वाले आचार्यश्री का विजन बहुत बड़ा था वे हर व्यक्ति की प्रतिभा देखकर उसे समाज सेवा के कार्य में लगाते रहे । आपके मार्गदर्शन में अनेकों विधान, अनेकों पंचकल्याणक प्रतिष्ठा, वेदी प्रतिष्ठा, अनेक विद्यालय, पाठशाला आदि का आयोजन होता रहा ।
बच्चों से लेकर बड़ों तक सभी का मार्गदर्शन करने वाले आचार्यश्री का आशीर्वाद देश के प्रमुख राजनेताओं ने भी प्राप्त किया था। जिनमें उपराष्ट्रपति सर्वश्री भैरोसिंह शेखावत, लालकृष्ण आडवाणी, राजनाथसिंह, नरेन्द्रसिंह तोमर, अशोक गहलोत, मुलायमसिंह यादव, शिवराजसिंह चैहान, दिग्विजयसिंह, कल्याणसिंह, प्रदीप जैन आदित्य, शीला दीक्षित, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट, साहिबसिंह वर्मा, अरविंद केजरीवाल, कपूरचंद घुवारा सहित अनेक राजनेता सम्मिलित है । आपका मार्गदर्शन समाज के लिए प्रेरणादायी था । देश के सभी वर्गों को आप एकत्रित करते रहे और एकता के साथ अहिंसा का संदेश देते रहे । आपके आशीर्वाद से अनेक प्रतिभाशाली विद्यार्थी बड़े होकर उच्च पदों पर पहुंचे और प्रतिदिन पानी छान कर पीने व मंदिर जाने व रात्रि भोजन न करने का नियम लेने के कारण वे जैनत्व का प्रचार करते रहे।
यह उनकी तपस्या का उल्लेखनीय तथ्य है कि वे हमेशा भगवान महावीर के पथ पर चलकर अपने आपको तपा कर कुंदन बनाने की प्रक्रिया में संलग्न थे।  ऐसा बताया जाता है कि वे कभी लेटकर विश्राम नहीं करते थे हमेशा उन्हें बैठा ही पाया गया।  ऐसे अद्वितीय, अद्भुत संत जो बाल ब्रह्मचारी, क्षुल्लक, मुनि, उपाध्याय, आचार्य पद पर प्रतिष्ठित हुए और हर पद की गरिमा को उन्होंने जिम्मेदारी से निभाया  जिसके कारण उनका दिगम्बर जैन श्रमण परम्परा में उल्लेखनीय योगदान रहा है जो स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाएगा ।
विनम्र विनयांजलि सहित… 

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