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श्रवणबेलगोला श्रवणबेलगोला यानी दिगम्बर जैन मुनियों का धवल सरोवर

गति के साथ विकास और धर्म के साथ सेवा का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करते हुए नित नया इतिहास रचता श्रवणबेलगोला एक जीवंत तीर्थ है। आत्मसाधना का केंद्र रहा श्रवणबेलगोला अब सामाजिक सेवा के लिए भी जाना जाने लगा है। वैसे भी इतिहास को जानना एक ऐसी पुस्तक को पढ़ने के समान है, जिसके आदि और अंत का पता नहीं। जैसे-जैसे पढ़ते जाएंगे, वैसे-वैसे नए अध्याय एक के बाद एक खुलते जाएंगे। जब तक नई जानकारी मिलती रहती है, ज्ञान के अन्वेक्षक उसका अनुसंधान करते ही रहते हैं। ऐसा ही ताना-बाना मन्दिर, तीर्थ क्षेत्र, संत, शास्त्र या किसी महापुरुष के जीवन इतिहास के साथ भी होता है। जब-जब उन पर खोज होती है तो इतिहास के अध्यायों में एक नया अध्याय, एक नया पृष्ठ जुड़ जाता है। वर्तमान भी अगले ही पल इतिहास बन जाता है। श्रवणबेलगोला पर भी समय-समय पर खोज होती रही हैं और हर बार इसके इतिहास की इबारत में नए अध्याय जोड़ती गईं। खास तो यह है कि नई खोज और पुराने इतिहास में कभी कोई विरोधाभास नहीं मिला। · श्रवणबेलगोला का ज्ञात इतिहास 7 वीं सदी से प्रारम्भ होता है, तब से जब यह आत्मसाधना का प्राकृतिक दुर्गम और दुरुह क्षेत्र था। · साधु और श्रावक आत्मसाधना, स्वाध्याय करते हुए समाधिमरण प्राप्त करते थे । इतिहास में इस काल के दौरान ऐसे ही प्रमाण मिलते हैं। · आज जिसे हम श्रवणबेलगोला कहते हैं, सातवीं सदी के पहले उस स्थान का क्या नाम रहा होगा, उस समय किन-किन संतों, श्रावकों ने यहां आत्मसाधना की होगी, यह खोज का विषय है) इतिहास गवाही देता है कि धीरे-धीरे यहां मन्दिरों, तालाबों, गुफाओं, मानस्तम्भों, शास्त्र-भण्डार आदि का निर्माण होना प्रारम्भ हुआ। श्रवणबेलगोला के इतिहास की गवाही के चार चरण · श्रवणबेलगोला के इतिहास और इसकी विकास यात्रा को मुख्य रूप से चार चरणों में बांटा जा सकता है। · तीन चरणों का विकास तो 13वीं सदी तक का माना जा सकता है और चौथा चरण तीन चरणों की प्राचीन थाती के संरक्षण और शिक्षा, चिकित्सा, समाज सेवा जैसे कामों के करीब 55 वर्ष में हुए विकास से सम्बद्ध है। यही श्रवणबेलगोला के इतिहास का प्रतिबिम्ब है। · प्रथम चरण 7वीं सदी से 9वीं सदी का है, जो आत्मसाधना व स्वाध्याय के लिए चर्चित रहा है। · दूसरा चरण 9वीं सदी से प्रारम्भ होता है, जब सम्राट अशोक ने यहां पर मन्दिर का निर्माण करवाया था। · तीसरा चरण 981 ईस्वी का है, जब आचार्य नेमीचन्द्र सिद्धांत चक्रवर्ती के सान्निध्य में चामुंडराय ने यहां भगवान बाहुबली की मूर्ति का निर्माण करवाकर विश्व को एक अद्भुत सौगात दी। · भद्रबाहु स्वामी ने भी अंतिम समय साधना कर अपना समाधिमरण यहीं पर कर इस स्थली की आध्यात्मिक साधना की कड़ी का क्रम बनाए रखा । · संतों ने यहीं पर अनेकों शास्त्रों की रचना की है। आज भी धवला, महाधवला की वाचनाओं के स्वर यहां सुनाई देते हैं । · श्रवणबेलगोला में अधिकांश मन्दिर, शिलालेख, स्तूपक, तालाब आदि के निर्माण की पृष्ठभूमि में किसी न किसी की याद या कोई घटना जुड़ी है। · श्रवणबेलगोला क्षेत्र के इतिहास और मन्दिरों आदि को उनके निर्माण से ही समय-समय पर तत्कालीन राजाओं, मंत्रियों या सत्ता से संरक्षण मिलता रहा है। · चौथा चरण आज से लगभग 55 वर्ष पहले प्रारम्भ होता है। तब से किसी मन्दिर, तालाब का निर्माण तो नहीं हुआ, लेकिन जो पहले से मौजूद हैं, उनकी सुरक्षा और इतिहास को जनमानस तक पहुंचाने के लिए प्राचीनता को नुकसान पहुंचाए बिना जीर्णोद्धार का काम काफी हुआ है। · शिक्षा, चिकित्सा, समाज सेवा और आवास के क्षेत्र में एक बड़ा परिवर्तन इस काल में हुआ । · यह सब काम वर्तमान के भट्टारक जगतगुरु कर्मयोगी स्वस्तिश्री चारूकीर्ति भट्टारक स्वामी जी के मार्गदर्शन में हुआ है। श्रवणबेलगोला के कई नाम, बाहुबली जी से लेकर जैनपुर तक · श्रवणबेलगोला के गोम्मटेश्वरम्, बाहुबली जी, जैन बद्री, बेलगोला, जैनपुर नए नाम हैं तो कल्वप्पु, कटवप्र, धवलतीर्थ और श्वेत सरोवर प्राचीन नाम हैं । करीब 2500 वर्ष पहले इसका नाम कोल था। श्रवणबेलगोला नामकरण आज से करीब 2400 वर्ष पहले सम्राट अशोक द्वारा किया गया । · श्रवणबेलगोला कन्नड़ शब्द है, जिसका अर्थ ‘दिगम्बर जैन मुनियों का धवल सरोवर।’ · श्रवणबेलगोला में एक वृहद शास्त्र-भण्डार था । धवला-महाधवला की वाचनाओं के स्वर यहां गूंजते थे, इसी कारण इसका नामकरण ‘धवल सरोवर’ हुआ। · यहां बसती हैं 40 बसदियां यानी मंदिर · श्रवणबेलगोला में चंद्रगिरि पर्वत, विंध्यगिरि पर्वत, नगर जिनालय, जिननाथपुर, हले बेलगोला, साणेहल्लि, जक्किकट्टे प्रमुख धार्मिक स्थल हैं। जहां कुल 40 बसदियां यानी मन्दिर हैं। · चंद्रगिरि पर्वत पर शांतिनाथ बसदि, सुपार्श्वनाथ बसदि, चन्द्रप्रभ या वक्रगच्छ बसदि, चामुंडराय बसदि, पार्श्वनाथ बसदि (मेगल बसदि), एरडु कट्टे बसदि, सवति गन्धवारण बसदि, तेरिन बसदि, शांितश्वर बसदि, मज्जिगण बसदि, शासन बसदि, चन्द्रगुप्त बसदि, कत्तले बसदि, अंतराल पार्श्वनाथ बसदि, भद्रबाहु स्वामी गुफा के 15 मन्दिर और मानस्तम्भ और इरुवे ब्रह्मदेव मन्दिर प्रमुख हैं। · विंध्यगिरि पर्वत पर आठ मंदिर हैं। चौबीस तीर्थंकर बसदि, ओदेगल बसदि, चेन्नण्ण बसदि, सिद्धर गुण्डु, अखण्ड बािगलु(भरत, बाहुबली भगवान प्रतिमा), सिद्धर बसदि, सुत्तालय बसदि, गोम्मटस्वामी मन्दिर । · श्रवणबेलगोला नगर और उसके आस-पास 17 मन्दिर हैं। जैन मठ मन्दिर, पार्श्वनाथ बसदि (जैन मठ मन्दिर के ऊपर), नेमिनाथ मन्दिर(जैन मठ मन्दिर के ऊपर), भण्डार बसदि, मंगायी बसदि, नगर जिनालय, दानशाला बसदि, सिद्धंात बसदि, अक्कनबसदि, जारुगुप्पे पार्श्वनाथ मन्दिर, लक्किवन, बड़े पहाड़ की परिक्रमा में पद्मावती गुफा, शांतिनाथ बसदि जिननाथपुर, पार्श्वनाथ बसदि जिननाथपुर, बस्ती हल्ली, हले बेलगोला, जक्कलांबा मन्दिर हैं। · सणे हल्ली बस्ती, समवशरण(अरिहंत निलय), पाण्डुक शिला मन्दिर, रत्नत्रय मन्दिर भी श्री दिगम्बर जैन मठ इंस्टीट्यूशंस मैनेजिंग कमेटी ट्रस्ट के अंतर्गत ही है। इन चार मन्दिर को मिलाकर श्रवणबेलगोला में 44 मन्दिर है। · कुष्मांडणी देवी मन्दिर को जैन मठ मन्दिर में ही गिना जाता है, जारुगुप्पे ब्रह्मदेव मन्दिर को जारुगुप्पे पार्श्वनाथ मन्दिर में ही गिना जाता है। मन्दिरों के खुलने का समय · भगवान बाहुबली के दर्शन सुबह 6 से शाम 6 तक किए जा सकते हैं। मठ मंदिर और भण्डारी बसदि, जो सबसे बड़ा मंदिर हैं, उसके दर्शन सुबह 6 से 8 बजे तक कर सकते हैं लेकिन यहां भण्डारी बसदि के सामने पांडुकशिला मन्दिर के दर्शन बाहर से 24 घण्टे हो सकते हैं। चरण · आचार्य भद्रबाहु स्वामी(चन्द्रगिरि पर्वत), चामुंडराय(विंध्यगिरि पर्वत), कुन्दकुन्द(चन्द्रगिरि पर्वत), चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर महाराज(नगर में), आचार्य श्री महावीर कीर्ति महाराज (चन्द्रगिरि पर्वत), मुनि प्रभाचन्द्र महाराज (सम्राट चन्द्रगुप्त) (चन्द्रगिरि पर्वत), गणधर चरण (विंध्यगिरि पर्वत)। धर्म से लेकर सिद्धांत जैसे ग्रंथों की रचना यहीं हुई · धर्म, न्याय, तर्क, पुराण, कथा, काव्य, व्याकरण, ज्योतिष, सिद्धांत जैसे ग्रंथों की रचना इसी पावन भूमि पर हुई हैं। जीवकाण्ड और कर्मकाण्ड, तिलोकसार, क्षपणासार की रचना आचार्य श्री नेमीचन्द्र सिद्धांत चक्रवर्ती देव ने यहीं पर महामंत्री चामुंडराय के निमित्त की थी। शाकटायन इन्द्र और चन्द्र जैसे व्याकरणचार्यों ने अपने व्याकरणों की रचना भी यहीं पर की थी। धवला, जयधवला जैसे तत्व ग्रंथों का प्रणयन यहीं पर हुआ। समंतभ्रद्राचार्य ने अपना ग्रन्धहस्ति महाभाष्य यहीं लिखा। आचार्य जिनसेनाचार्य ने अपना महापुराण यहीं गढ़ा। रविषेण आचार्य ने पद्मपुराण की रचना भी यहीं की। बोलती चट्‌टानों से लेकर कुन्दकुन्द गुफा तक · श्रवणबेलगोला नगर में शांति सागर स्मारक, कला भवन, जनमंगल कलश, कल्याणी तालाब, आदि कवि पंप ग्रंथालय, धर्म चक्र, राजा श्रेयांस आहारशाला, जैन मठ मन्दिर की दीवारों पर बनी पेंटिंग, पद्मावती गुफा आदि हैं। विंध्यगिरि पर्वत पर कुन्दकुन्द गुफा, गुल्लिका अज्जी प्रतिमा, त्यागद स्तम्भ, अखण्ड बागिलु, नेमीचन्द्र पीठ, दानशाला मण्डप, अष्टदिग्पाल मण्डप आदि हैं। चन्द्रगिरि पर्वत पर चामुंडराय शिला, चन्द्रगुप्त शिला, महानवमी मण्डप, भरत मूर्ति(अधूरी), गंगराज मण्डप, शांतलादेवी स्तम्भ, चतु:स्तम्भ मण्डप, इन्द्र स्तम्भ, वीरगल्लु स्तम्भ, निषेधिका मण्डप, मानस्तम्भ, जाली(दासोज), बोलती चट्टानें आदि हैं। देश में सबसे ज्यादा कुल 600 शिलालेख यहीं पर · देश भर में सबसे अधिक शिलालेख श्रवणबेलगोला में ही मिलते हैं । · चंद्रगिरि, विंध्यगिरि, नगर व आस-पास के गांवों में 559 शिलालेख हैं। · चंद्रगिरि पर 274 शिलालेख हैं, जिसमें से कुछ अप्रकट हैं । · विंध्यगिरि पर 172, नगर परिसर में 80 और आस-पास के गांवों में 33 शिलालेख मिलते हैं, जो इस तीर्थ से ही संबंधित हैं । · यह सभी शिलालेख ईस्वी 600 से 19 वीं सदी तक के बीच के हैं। दसवीं सदी के पहले के सभी शिलालेख चंद्रगिरि पर ही हैं । · विंध्यगिरि पर सन् 980 के पहले का कोई शिलालेख नहीं है। · सब शिलालेख शैलसंस्तर, स्तंभों, मानस्तंभों, मंदिर के बाहरी हिस्सों, शिलाओं तथा मूर्तियों पर लिखे गए हैं । · अत्यंत प्राचीन मराठी शिलालेख विंध्यगिरि पर भगवान बाहुबली की मूर्ति के पास लिखा गया है । · सभी शिलालेखों के 90 प्रतिशत प्राचीन कन्नड़ लिपि में हैं, शेष की भाषा संस्कृत है । · समय-समय पर शिलालेखों की संख्या बढ़ती गई। जैसे-जैसे नए शिलालेख मिलते गए, वैसे-वैसे संख्या में भी परिवर्तन होता गया। · कहा जाता है कि बड़ी संख्या में शिलालेख नष्ट भी हुए हैं। क्या कहते हैं ये शिलालेख · प्राचीन राजाओं की दिग्विजय या श्रावकों के पराक्रम संबंधी 40 शिलालेख। · दान-पूजा आदि के 100 शिलालेख। · मंदिर के िनर्माण तथा तत्संबंधी जीर्णोद्धार के 100 शिलालेख। · संल्लेखनापूर्वक मरण प्राप्त करने वाले जैन-मुनियों तथा गृहस्थों की प्रशस्तियों के 100 शिलालेख · संघों या यात्रियों की यात्रा के स्मारक के रूप में 160 शिलालेख। · 100 ऐतिहासिक शिलालेख। सरोवरों का नगर · श्रवणबेलगोला को सरोवरों का नगर भी कह सकते हैं। · शेट्टेर ने अपनी श्रवणबेलगोला पुस्तक में छोटे- बड़े, सब मिलाकर करीब 50 तालाबों का उल्लेख किया है, । · सबसे अधिक सुन्दर तालाब विंध्यगिरि और चंद्रगिरि पहाड़ के बीच कल्याणी नाम का तालाब है। · चंद्रगिरि पर्वत पर लेक्कि दोणे, देवर दोणे और कंचिन दोणे । · विंध्यगिरि पर्वत पर चेन्नण्ण बस्ती (मन्दिर) के दोनों ओर नगर में जक्किकट्टे, चेन्नण्ण कुंड इसके अलावा नगर और उसके आस-पास कई तालाब हैं। 50 तालाबों में सबसे सुंदर कल्याणी सरोवर · नगर के बीचो-बीच एक ऊंचे परकोटे से घिरा हुआ, चारों ओर सीिढ़यों वाला यह मनोहर
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