आलेख

श्रुत पंचमी- उद्भव एवं महत्व” -ब्र. डॉ सविता जैन

अनादिनिधन जैन धर्म में भगवान आदिनाथ से लेकर भगवान महावीर पर्यंत श्रुत परंपरा श्रोत्र रूप में निर्बाध रूप से सतत प्रवाह मान होती रही है। भगवान महावीर के निर्वाण के पश्चात तीन अनुबद्ध केवली व पांच श्रुतकेवलियो के संपूर्ण वांग्मय प्रवाह मान रही किंतु अंतिम श्रुत केवली भद्रबाहु स्वामी के पश्चात विशाखाचार्य आदि 11 आचार्य, 11 अंगों व कुछ पूर्वो के एकदेश ज्ञाता रहे ।

इस प्रकार भगवान महावीर के निर्वाण के लगभग 683 वर्षों बाद तक अंग,पूर्व वेत्ताओं की परंपरा अक्षुण्ण बनी रही । आचार्य परंपरा में ज्ञान प्रवाहित होते हुए आचार्य धरसेन को सभी अंग व पूर्वो का एक देश ज्ञान प्राप्त हुआ।आचार्य धरसेन महाराज काठियावाड़ में स्थित गिरनार पर्वत की चंद्र गुफा में निवास करते थे। वे अष्टांग महानिमित्त के पारगामी व प्रवचन कुशल थे ।[ वे निमित्त शास्त्र में पारंगत थे । मंत्र ,ज्योतिष व आयुर्वेद पर उन्होंने जोणि पाहुण नामक ग्रंथ लिखा था। जब वे वृद्ध हो गए तो अपनी अल्पआयु जानकर उन्हें यह चिंता हुई कि अवसर्पिणी काल के प्रभाव से श्रुत ज्ञान का दिनोंदिन ह्रास होता जा रहा है । काल के प्रभाव व स्मरण शक्ति की क्षीणता के कारण से यह श्रुत ज्ञान सदैव के लिए समाप्त ना हो जाए अतः इसे योग्य शिष्यों को प्रदान कर इसे लिपिबध्द कर आगामी पीढ़ी के लिए सुरक्षित करना होगा। महान परोपकारी संत आचार्य श्रीधरसेन जी ने श्रुत संरक्षण के वात्सल्य से प्रेरित होकर दक्षिण में महिमा नगर में हो रहे आचार्य सम्मेलन के प्रमुख आचार्य अहर्दबलि जी को पत्र लिखकर आगम ज्ञान की दिनोंदिन होती क्षीणता के प्रति चिंता व्यक्त करते हुए दो योग्य शिष्यों को भेजने का आग्रह किया ।आचार्य अहर्दबलि जी ने सभी प्रकार से योग्य दो शिष्यों को आचार्य धरसेन जी से शिक्षा ग्रहण करने हेतु भेज दिया । जिस दिन पर दोनों साधु आचार्य धरसेन जी के पास पहुंचने वाले थे उसकी पूर्व रात्रि मैं आचार्य धरसेन जी ने स्वप्न देखा कि दो धवल व विनम्र बैल उनके चरणों में आकर बैठ गए । इस प्रकार के स्वप्न को देखकर संतुष्ट होते हुए धनसेनाचार्य ने “जयदु सुय देवता” – श्रुत देवता जयवंत हो ऐसे वचन का उच्चारण किया। उसी दिन वे साधु धनसेनाचार्य जी के पास पहुंच गए उन्होंने पूर्ण विनय करने के पश्चात कहां की आपकी मंशा अनुरूप हम दोनों आपके पादमूल में उपस्थित हैं। आचार्य श्रीधनसेनाचार्य जी ने उनसे कई प्रश्नों को पूछकर संतोष व्यक्त किया तथा दो दिन विश्राम करने को कहा। दो दिन पश्चात आचार्य जी ने दोनों नवागत साधुओं की परीक्षा हेतु दोनों को एक-एक मंत्र सिद्ध करने को दिया क्योंकि -“सुपरिक्खा हियय णित्तु करोति ” अर्थात उत्तम प्रकार से ली गई परीक्षा ह्रदय में संतोष उत्पन्न करती है। दोनों नवागत साधु गुरु की आज्ञा से मंत्र सिद्धि हेतु वहां से निकल गए । विद्या सिद्ध होने के उपरांत उन्होंने विद्या की अधिष्ठात्री देवियों को देखा कि एक देवी के दांत बाहर निकले हुए हैं और दूसरी कानी है। विकृतांग होना देवताओं का स्वभाव नहीं है। इस प्रकार दोनों ने विचार कर मंत्र व्याकरण में कुशल दोनों मुनियों ने अधिक अक्षर वाले मंत्र से अक्षर कम करके एवं कम अक्षर वाले मंत्र में अक्षर मिलाकर मंत्र सिद्ध किया तो दोनों देवियां अपने स्वाभाविक व सुंदर रूप में उपस्थित हुई। तत्पश्चात गुरुवर धरसेनाचार्य के समक्ष पहुँच कर योग्य विनय सहित उन दोनों ने विद्या सिद्धि संबंधी समस्त वृतांत को निवेदन किया।बहुत अच्छा! इस प्रकार संतुष्ट हुए धरसेनाचार्य ने शुभ तिथि, नक्षत्र आदि में ग्रंथ का पढ़ाना प्रारंभ किया। इस प्रकार क्रम से व्याख्यान करते हुए धरसेन स्वामी ने आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को पूर्वान्ह काल में ग्रंथ समाप्त किया। अपनी आयु का अंतसमय निकट जानकर शिष्यों को उनके वियोग से संक्लेश ना हो यह सोचकर और वर्षा काल समीप देखकर धरसेनाचार्य ने उन्हें उसी दिन विहार करने का आदेश दिया।

यद्यपि वे दोनों साधु गुरु के चरणों में कुछ अधिक समय रहना चाहते थे तथापि गुरु के वचन अनुकरणीय होते हैं। ऐसा विचार कर दोनों साधु ने विहार कर अंकलेश्वर (गुजरात) में वर्षा योग किया । वर्षा काल के पश्चात पुष्पदंतजी ने कर्नाटक प्रदेश में तथा भूतबलि जी ने तमिल देश में बिहार किया । गुरु से प्राप्त ज्ञान को पुस्तकाकर रूप में निबद्ध करने का विचार कर पुष्पदंत जी ने *सत्प्ररूपणा* नामक प्रकरण की रचना की तथा जिनपालित नाम के शिष्य के साथ वह प्रकरण भूतबलि जी के पास भेजा । उन्होंने पुष्पदंत जी का अभिप्राय समझकर शेष प्रकरणों की रचना कर ग्रंथ पूर्ण किया। महाकर्म प्राभृत विच्छेदन न हो इस प्रकार विचार कर भूतबलि जी ने द्रव्य प्रमाणानुगम को आदि लेकर ग्रंथ की रचना जीवस्थान, क्षुद्रबन्ध, बंधस्वामित्व, वेदना ,वर्गणा, और महाबंध इन छः खंडो की रचना कीअतः इसे “षटखण्डागम” नाम दिया गया । आगमो कोपुस्तक रूप में निबद्ध करने का यह कार्य नई परंपरा का प्रारंभ था। इसके पूर्व गुरु शिष्यों की मौखिक परंपरा में ही आगम का अध्ययन होता था।जैन संघ ने इस उपक्रम का अभिनंदन कर इस प्रथम लिखित ग्रंथ के पूर्ण होने की तिथि जयेष्ठ शुक्ल पंचमी को शास्त्र पूजा के पर्व श्रुत पंचमी के रूप में मनाना प्रारंभ किया।

ज्येष्ठ सित पक्ष पंचम्या चातुर्वर्ण्यसंघ समवेत ।
ततपुस्तकोपकरणै व्यार्धात क्रियापूर्वकं पूजाम।।48।।
श्रुतपंचमीती सेन प्रख्यातिं तिथरयं परामाप
अधापि येन वस्यां श्रुतपूजां कुर्वंते जैन: ।।
इन्द्रनंदीश्रुतावतार

अर्थ :- भूतबली आचार्य ने षटखण्डागम की रचना करके ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी को चतुर्विध संघ के साथ उन शास्त्रों को उपकरण मानकर श्रुत ज्ञान की पूजा की जिससे श्रुत पंचमी तिथि प्रख्याति जैनियों में आज तक चली आ रही है ।

इस तिथि को श्रुत की पूजा की जाती है । वर्तमान भौतिकवादी युग में श्रुत पंचमी का त्योहार एक औपचारिकता का त्यौहार बनकर रह गया है हम सिर्फ एक दिवस शास्त्रों की सज्जा, वेष्टन, पूजन आदि करके अपनी शास्त्र विनय प्रदर्शित कर देते हैं किंतु यह सब पर्याप्त नहीं है । हमारे प्राचीन आचार्यों ने जो उपकार किया है उसके महत्व को समझना होगा। श्रुत (शास्त्र) हमारा संविधान है जिसमें तीर्थंकर परमात्मा के उपदेश निहित हैं ।हमें उनके अनुसार जीवन यापन करने हेतु उन्हें प्रतिदिन पढ़ना और पढ़ाना होगा, इस हेतु प्रतिदिन स्वाध्याय की वृत्ति को अपनाना होगा। ग्रंथों के सरलीकरण को ना देखते हुए मूल ग्रंथों से दृष्टिकोण को समझना होगा क्योंकि यदि ग्रंथों का सरलीकरण होगा तो संस्कृति का क्षरण होगा क्योंकि किसी भी दर्शन संस्कृति की प्राचीनता मौलिकता उसके साहित्य से ही आकी जाती है ,क्योंकि कहा है कि:-

अंधकार है वह क्षेत्र जहां आदित्य नहीं,
मुर्दा है वह देश जहां साहित्य नहीं।

ब्र. डॉ सविता जैन
अधिष्ठात्री
श्री दिगंबर जैन धर्म स्थल तीर्थ क्षेत्र रतलाम (मध्य प्रदेश)

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