आलेख

तीर्थंकर महावीर और उनके द्वारा उपदेशित अहिंसा – डाॅ. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’, इन्दौर

तीर्थंकर महावीर का उदय ऐसे समय में हुआ, जहाँ मानव क्रूर हिंसा की क्रिया में लिप्त था। हिंसा का बोलबाला था। आज भी जहाँ यह स्थिति परिलक्षित हो रही है इसे पाटने के लिए उनका मार्ग ही श्रेयस्कर है। उनके जीवन से हम सब आज भी परिवर्तन ला सकते हंै।चैत्र सुदी तेरस का दिन महान पवित्र दिन है जब चैबीसवें तीर्थंकर महावीर ने जन्म लिया जिससे अंधकार पर प्रकाश अनाचार पर सदाचार, अज्ञान पर ज्ञान की ज्योतिर्मय सर्वोदय तीर्थ की किरणें परिस्फुटित र्हुइं। अंतिम तीर्थंकर महावीर ने धर्ममय जीवनधारा को बहाया।

अब से 2620 वर्ष पूर्व पावन वसुंधरा विदेह देशस्थ कुंडलपुर में राजा सिद्धार्थ एवं माता त्रिशला देवी के यहाँ बालक वर्द्धमान ने जन्म लिया। जन्मते ही सारे विश्व में सुख शांति छा गयी, षट ऋतुएं एक साथ फलने फूलने लगीं। उन्हें पाकर माता त्रिशला, पिता सिद्धार्थ को अपार हर्ष हुआ, और संतप्त प्राणियों को जीने की राह मिली। जो पूर्व में देवताओं द्वारा पूजित था, वही महावीर के जीव ने कुछ कम बहत्तर वर्ष आयु लेकर पुष्पोत्तर नामक विमान से च्युत होकर आषाढ़ शुक्ला षष्ठी के दिन कुण्डलपुर के नृप सिद्धार्थ क्षत्रिय कुलनाथ में सौ देवियों से सेवमान प्रियकारिणी त्रिशला देवी के गर्भ में रहकर नौ मास, आठ दिन बाद चैत सुदी तेरस की रात में उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में जन्म लिया।

जन्मते ही नरक के जीवों को एक क्षण के लिए सुख-शांति प्राप्त हुई। सोलह कलाओं की तरह महावीर वृद्धि को प्राप्त हुए इसलिए इनका नाम वर्धमान रखा। क्रूर हिंसा का ताण्डव देख उन्हें संसार की असारता का भान हुआ।
30 वर्ष की भरी जवानी में वे गृह बंधन से व्यामोह तोड़कर आत्म साधना के पथ पर चल तपश्चरण करने लगे। माँ ने बहुत रोका, शादी का प्रस्ताव रखा, पर वे मोह के बंधन में नहीं फँसे। माघ सुदी दसवीं के दिन ऋजुकूला सरिता तट के पर ज्ञातृ उद्यान में अशोकवृक्ष के नीचे ओम् ओम् कहते हुए पंचमुष्टि केश लोंच कर छह माह उपवास का नियम लेकर दिगम्बर अर्थात् दिशा (आत्म लक्ष्य) ही जिनका अम्बर है ऐसे वीतराग मुद्राधारी हो गये।

बारह वर्ष तक घोर तप की साधना में, ध्यानाग्नि में कर्म जलाते हुए संलग्न रहे। श्री रवीन्द्रनाथ टैगोर ने उनकी तपस्या के बारे में लिखा है कि भगवान् महावीर भवों का नाश करने लगे, उनकी आत्मा को कोई नहीं डिगा सका। वे भानु की तरह अग्रसर होते गये। द्वादश वर्ष, पाँच माह, पन्द्रह दिन छद्मस्थ अवस्था में रहकर घोर तपश्चरण के द्वारा उन्होंने रत्नत्रय से शुद्ध ऋजु कूला सरिता तटवर्ती शिलापट्ट पर छह उपवास के साथ आतापन योग करते हुए अपराह्न काल में चार घातिया- ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय, अन्तराय; कर्मों को नष्ट कर केवलज्ञान प्राप्त किया।

42 वर्ष की अवस्था में केवलज्ञान की इस उपलब्धि से सही रूप में वे उपदेश देने की दक्षता प्राप्ति कर चुके थे। अब उनकी देवोपनीत उपदेश सभा लगती जिसे समवशरण कहा जाता है। जिसमें उपदेश सुनने का सभी जीवों को समान अवसर प्राप्त होता है और महावीर की वाणी सभी जीवों को अपनी अपनी भाषा में सुनाई देती है।

महावीर के संदेश-सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, सर्वोदय अनेकांत, स्याद्वाद मानव जीवन के उत्थान के लिए कल्याणकारी सिद्ध हुए। जो आज के जीवन में भी अनुकरणीय हंै। भगवान् महावीर का सर्वप्रथम संदेश था-अहिंसा। प्रत्येक प्राणी जीना चाहता है अतः किसी को मन, वचन के भावों द्वारा दुःख पहुँचाना हिंसा है। इनका न होना अहिंसा है। अहिंसा सर्वधर्मों की जननी है। पर हम आज भगवान् महावीर, राम, हनुमान के संदेशों को भूल गये। भगवान महावीर ने जुआ खेलना, मांस खाना, मदिरा पान करना, वेश्या गमन, चोरी, परस्त्री रमण; इन सात व्यसनों से विलग रहने को कहा और हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील, परिग्रह से को छोड़ने का विशेष उपदेश दिया। इनमें हिंसा प्रायः सभी पापों की जननी कही जाती है।

रागादि भावों की जहाँ उत्पत्ति है वहाँ हिंसा है, और रागादि भावों का मन, वचन, काय से न होना ही अहिंसा है। अहिंसा सर्व धर्माें का सार है। ‘‘अहिंसा परमोधर्मः’’ अहिंसा ही परम धर्म है। इसे स्वच्छ जीवन का दर्पण भी कहते हैं। इसका जीवन में पालन-धारण करने से करुणा की अविरल धारा बहने लगती है। सत्त्वेषु मैत्री की भावना उमड़ती है। अहिंसा माता के सामान है और करुणा दावाग्नि को शांति करने के लिए मेघों की वर्षा के समान है। पीड़ित मन के दुःख मिटाने के लिए परम औषधि है। यह कथन योग शास्त्र का है।
अहिंसा के बल पर विदेशियों से गांधी जी ने देश को आजादी दिलायी। पर लोग उनके विचारों को भूल गये और अहिंसा को भी भूल गये।

इस आर्य संस्कृति का संबंध शाकाहार से जुड़ा है। महात्मा मनु ने मनुस्मृति में कहा है- जिसका मैं मांस भक्षण करता हँू, वह मुझे जन्मांतर तक खायेगा। प्राणियों का वध करने से स्वर्ग नहीं, वह आपत्ति का, नरक का द्वार है, जहाँ घोर दुःख उठाने पड़ते हैं। अतः अहिंसा का पालन आवश्यक है। जगत के शत्रु-मित्र और सभी जीवों के प्रति समभाव रखना, जीवनभर प्राणियों के प्रति विराधना न करना ही अहिंसा व्रत है। गांधी जी ने अहिंसा के ऊपर अत्यधिक जोर देकर कहा कि धर्म हिंसा से रहित ही है। प्रत्येक प्राणियों पर दया, करुणा भाव हो तभी अहिंसा होगी। उनकी हिंसा शस्त्र रहित थी। सभी प्राणियों पर समभाव रखंे; यही अहिंसा है। जब तुम्हें कोई दुःख प्रिय नहीं है तो फिर किसी को दुःख क्यों देते हो? को धम्मो? धर्म क्या है? जीव दया। जीव दया का नाम ही अहिंसा धर्म है।
अहिंसा सर्वोदय तीर्थ के समान है। अहिंसा ही आत्मा की परमोत्कृष्ट अभिव्यक्ति है। जिस आत्मा में अहिंसा का निवास है वही सर्वोत्कृष्ट पद को पा लेता है।

किसी के मन को दुख पहुंचाना भी हिंसा कही गई है। हमारे वर्ताव से किसी के मन को थोड़ा भी कष्ट पहुंचता है तो वह हिंसा है। इसी अहिंसा का व्रत लेकर महात्मा गांधी ने मानव मानव में समता का पाठ पढ़ाया। किसी के प्रति राग, द्वेष उत्पन्न न होना ही अहिंसा है। चराचर जितने भी विश्व में जीव हैं उनके प्रति करुणा भाव रखना एवं मन, वचन, काय से न सताना, दुःख न देना ही अहिंसा है। सभी प्राणियों पर समभाव रखना अहिंसा है। अहिंसा धर्म की शरण ही देश, समाज, राष्ट्र का उत्थान करने में समर्थ है। अहिंसा की ज्योति सदा जलती है वह कभी क्षीण नहीं होती है। यह ज्योति समस्त लोक के कण-कण में व्याप्त है। अज्ञान अन्धकार का नाश इसी ज्योति के द्वारा सम्भव है। अहिंसा की ज्योति अमिट और सुख शान्ति की अभिव्यक्ति वाली है।

जिस आत्मा में अहिंसा का सम्पूर्ण आलोक आलोकित होता रहता है उस आत्मा में ‘‘अहिंसा भूतानां विदिते जगति ब्रह्म परमम्’ का स्वरूप प्रतिबिम्बित होता रहता है। यदि आज की लड़खड़ाती हिंसामयी दुनिया में यह अहिंसा-दीपक आलोकित हो जाये तो सारे जगत में सुख शान्ति का साम्राज्य अनायास हो जाये। आज सम्पूर्ण विश्व चतुर्कषायों-क्रोध, मान, माया, लोभ एवं हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील, परिग्रह; इन पाँच पापों के काली घटाओं से घिरा है एवं एटम बम, परमाणु आदि विनाशकारी भयंकर विस्फोटक अस्त्र-शस्त्रों के निर्माण एवं विनाश की लीला में लगा हुआ है। सुख-शान्ति के अमोघ अस्त्र अहिंसा धर्म को भूूलता जा रहा है। अहिंसा की वृत्ति से मानव कल्याण होता है, जीवन में सुधार होता है। अहिंसा में कायरता नहीं। वह वीर पुरुषों का बाना है। ‘‘वीर भोग्या वसुन्धरा’’; यह सूक्ति है। वीर पुरुष ही अहिंसा के बल पर समाज व राष्ट्र को समृद्धशाली व सुखी बना सकता है। अहिंसक वीर पुरुष होता है। वह निर्भयी, निरभिमानी प्राणी मात्र का हित चिंतक होता है। उस की उपादेयता समस्त विश्व में ग्राह्य होती है। वह कोटि-कोटि जनता का शुभ चिन्तक होता है। अहिंसक पुरुष विश्वशान्ति का इच्छुक होता है।

आज विश्व में युद्ध के बादल छाये हुए हैं। मानव-मानव में ईष्र्या, द्वेष, दंभ, क्रोध की ज्वालायें प्रज्वलित रूप से विस्फोटक बन रही हैै। जर, जोरु, जमीन की लड़ाई विश्व में व्याप्त है। हजारों व्यक्तियों का नरसंहार हो रहा है। अरबों रुपयों, डालरों का नुकसान हो रहा है। मानवता त्राहि-त्राहि मचा रही है। एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र का हनन करने में लगे हैं। एक देश-दूसरे देश को फलता-फूलता देखना नहीं चाहते हैं। अधिकतर देश आतंकवाद के साये में हंै। मानवीय वृत्तियां खोटी-कुत्सित होती जा रही हंै। आज विश्व में सुख शांति की छाया लेशमात्र नहीं दिख रही है। भगवान् महावीर ने ज्ञान के द्वारा समस्त विश्व के लिये सुख-शांति की ज्योति जलाई व मानव को उत्तम राह मिली।

अहिंसा द्वारा प्राणी मात्र को सहिष्णुता, दया, करुणा का पाठ सीखने को मिलता है। भगवान् महावीर ने अहिंसा पर जोर दिया और कहा कि किसी भी जीव की हत्या न करना, किसी को पीड़ा न पहुँचाना, किसी को दास न बनाना, किसी को यातना न पहुँचाना, किसी का शोषण न करना। राग-द्वेष रूपी शत्रु तो लड़ाई कराते हैं, जीव को जन्म जन्मान्तरों तक भटकाते हैं। जैन दर्शन में अहिंसा और स्याद्वाद को प्राण कहा गया है। हिंसा चार प्रकार की कही गई है-संकल्पी, आरम्भी, उद्यमी, विरोधी। इसमें से गृहस्थ संकल्पी हिंसा का त्याग करके आरम्भी, उद्योगी हिंसा का त्याग नहीं करता; पर व्यापार आदि में व्यर्थ हिंसा से सदा बचता रहता है। हिंसा पाप का ही कारण है जो सदा संसार में ही भटकाता रहता है। व्यापार, में आरम्भ से ही हिंसा होती है जो परिग्रह का कारण है, पर सीमित रूप से नियम मर्यादा करके करने से दोषों से बचा जा सकता है।

रागद्वेष के वशीभूत होकर किसी को नहीं मारना, कष्ट नहीं पहुंचाना; यही जैनागम में अहिंसा कहा हैै और कष्ट देना हिंसा कहा है-
अहिंसैव जगन्माताऽहिंसेवानंदपद्धतिः।
अहिंसेव शिवसुतेदत्त च त्रिदिवश्रियम्।।
अहिंसा संसार की माता है, अहिंसा आनन्द प्राप्ति का मार्ग है। अहिंसा से कल्याण होता है। ‘अहिंसेवगतिः साध्वी’ अहिंसा श्रेष्ठ है। जैसे परमाणु से कोई छोेटा नहीं होता है और आकाश से कोई बड़ा नहीं होता उसी प्रकार अहिंसा लक्षण रूप धर्म से बढ़कर कोई धर्म नहीं होता। आज भी राम, कृष्ण, बुद्ध व महावीर के उपदेश प्रासंगिक हैं। शासन और शासक को देश को सुखी बनाना है तो हिंसा का दौर बंद कर देना चाहिए। हिंसा के कारणों से पर्यावरण बिगड़ा है। अतः भगवान महावीर के द्वारा उपदेषित अहिंसा के परिपालन सभी का कल्याण है। यदि मानव तीर्थंकर महावीर के उपदेशों में से अहिंसा और अपरिग्रहवाद को ही अपना ले तो वसुधैव कुटुम्बकम् की उक्ति चरितार्थ हो जाऐगी।

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